समाचार में क्यों?
पश्िचमासिया (West Asia) में भू-राजनीतिक तनावों ने भारत के कॉफी निर्यात में भारी कटौती की है। मार्च 2026 की शुरुआत से Strait of Hormuz के आसपास शिपिंग मार्ग बाधित हो गए हैं, जिससे दुबई और कुवैत जैसे बाजारों के लिए जाने वाले भारतीय कॉफी के लगभग 300 कंटेनर फंस गए हैं। निर्यातकों का कहना है कि माल ढुलाई की लागत (freight costs) बढ़ गई है और कुछ शिपमेंट को बीच में ही उतार दिया गया है, जिससे भुगतान में देरी हो रही है और नुकसान बढ़ रहा है।
पृष्ठभूमि
भारत में कॉफी की खेती 17वीं सदी में शुरू हुई, जब ऐसा माना जाता है कि बाबा बुदन ने यमन से सात कॉफी के बीज चिक्कमगलुरु की पहाड़ियों में तस्करी करके लाए थे। आज भारत मुख्य रूप से छायादार बागानों (shaded plantations) में Arabica और Robusta किस्मों को उगाता है, जहां ऊंचे पेड़ कॉफी की झाड़ियों को अत्यधिक धूप और हवा से बचाते हैं। महत्वपूर्ण बढ़ती परिस्थितियों में शामिल हैं:
- मिट्टी: गहरी, थोड़ी अम्लीय (acidic) मिट्टी जो कार्बनिक पदार्थों से भरपूर हो।
- ऊंचाई: Arabica 1,000-1,500 मीटर पर पनपती है, जबकि Robusta 500-1,000 मीटर पसंद करती है।
- तापमान: Arabica के लिए 15-25 °C और Robusta के लिए 20-30 °C।
- वर्षा और आर्द्रता: Arabica को 1,600-2,500 मिमी वर्षा और मध्यम आर्द्रता की आवश्यकता होती है; Robusta को 1,000-2,000 मिमी और अधिक आर्द्रता की आवश्यकता होती है।
भारत के अधिकांश कॉफी उत्पादन में तीन राज्यों का योगदान है: कर्नाटक (लगभग 70 प्रतिशत), केरल (लगभग 20 प्रतिशत) और तमिलनाडु (लगभग 5 प्रतिशत)। लगभग दो-तिहाई फसल का निर्यात किया जाता है, जिसमें इटली, जर्मनी, रूस और बेल्जियम प्रमुख गंतव्य हैं। West Asia का भारत के कॉफी निर्यात में लगभग 16 प्रतिशत हिस्सा है, जिससे उस क्षेत्र में व्यवधान महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
संघर्ष का प्रभाव
- फंसे हुए शिपमेंट: लगभग 300 कंटेनर, जिनमें से प्रत्येक में 20 टन कॉफी है, में देरी हुई है या उनके मार्ग को बदल दिया गया है क्योंकि वाहक (carriers) Strait of Hormuz से बच रहे हैं। कुछ जहाजों ने अपनी यात्रा समाप्त करने की घोषणा की है और समय से पहले ही माल उतार दिया है।
- बढ़ती लागत: लंबे मार्गों और उच्च बीमा प्रीमियम के कारण माल ढुलाई शुल्क कई गुना बढ़ गए हैं। सुरक्षित बंदरगाहों के माध्यम से शिपमेंट को फिर से रूट करने के लिए निर्यातकों को अधिक भुगतान करना पड़ रहा है।
- नकदी प्रवाह की समस्या (Cash-flow issues): शिप की गई कॉफी का भुगतान आमतौर पर तभी प्राप्त होता है जब खेप खरीदारों तक पहुंचती है। शिपमेंट रुकने से निर्यातकों को तरलता संकट (liquidity crunches) का सामना करना पड़ रहा है और वे ऋणों पर चूक (default) कर सकते हैं।
- बाजार की अनिश्चितता: West Asia में आयातक संघर्ष के बीच नए ऑर्डर देने से कतरा रहे हैं, जिससे निर्यात मात्रा में गिरावट का खतरा पैदा हो गया है। कॉफी उद्योग को अपने 80 प्रतिशत तक के होनहार विकास बाजार को खोने का डर है।
महत्व
- मैक्रो-आर्थिक प्रभाव: कॉफी निर्यात West Asia के साथ भारत के व्यापक व्यापार संबंधों का हिस्सा है, जो भारत के कुल निर्यात का लगभग 16 प्रतिशत है। व्यवधान से समग्र निर्यात आय (export earnings) प्रभावित हो सकती है।
- विविधीकरण (Diversification) की आवश्यकता: यह संकट व्यापार मार्गों और गंतव्यों में विविधता लाने के महत्व पर प्रकाश डालता है। निर्माता किसी एक क्षेत्र पर निर्भरता कम करने के लिए वैकल्पिक बाजारों और शिपिंग लाइनों की खोज कर रहे हैं।
- घरेलू समर्थन: नीति निर्माताओं को कॉफी उत्पादकों और निर्यातकों को संकट से उबारने में मदद करने के लिए क्रेडिट राहत (credit relief) या निर्यात प्रोत्साहन (export incentives) की पेशकश करने की आवश्यकता हो सकती है।
निष्कर्ष
हालांकि भारत की कॉफी अपनी छाया-निर्मित (shade-grown) गुणवत्ता के लिए प्रसिद्ध है, यह उद्योग भू-राजनीतिक झटकों (geopolitical shocks) के प्रति संवेदनशील है। लचीली (resilient) आपूर्ति श्रृंखलाएं बनाना और निर्यात गंतव्यों को व्यापक बनाना हजारों कॉफी किसानों और व्यापारियों की आजीविका को बनाए रखने के लिए आवश्यक होगा।
स्रोत: Maritime Gateway