Economy

Districts as Export Hubs: DEH पहल, विदेश व्यापार नीति और MSME क्लस्टर

Districts as Export Hubs: DEH पहल, विदेश व्यापार नीति और MSME क्लस्टर

ख़बरों में क्यों?

सरकार ने प्रत्येक जिले के अद्वितीय उत्पादों और सेवाओं का दोहन करके निर्यात को बढ़ावा देने के लिए निर्यात केंद्र के रूप में जिले (Districts as Export Hubs - DEH) पहल का विस्तार किया है। हालिया अपडेट इस बात पर प्रकाश डालते हैं कि राज्य और जिला निर्यात संवर्धन समितियाँ (Export Promotion Committees) अब हर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश में मौजूद हैं, और अधिकांश जिलों के लिए मसौदा जिला निर्यात कार्य योजनाएँ (District Export Action Plans) तैयार की गई हैं। योजना के तहत प्रचार के लिए विशिष्ट उत्पादों—गुजरात में सिरेमिक (ceramics) से लेकर मध्य प्रदेश में फलों तक—की पहचान की गई है।

पृष्ठभूमि

भारत की विदेश व्यापार नीति (Foreign Trade Policy) के तहत शुरू की गई DEH पहल का उद्देश्य प्रत्येक जिले की क्षमता का दोहन करके निर्यात प्रोत्साहन का विकेंद्रीकरण (decentralise) करना है। यह तुलनात्मक लाभ वाले उत्पादों की पहचान करके, गुणवत्ता और ब्रांडिंग में सुधार करके और उत्पादकों को वैश्विक बाजारों से जोड़कर जिलों को आत्मनिर्भर निर्यात केंद्र में बदलने की परिकल्पना करता है। यह पहल निर्यात को दोगुना करने और ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में रोजगार के अवसर पैदा करने के सरकार के लक्ष्य के अनुरूप है।

प्रमुख घटक

  • संस्थागत ढांचा: प्रत्येक राज्य और केंद्र शासित प्रदेश ने एक राज्य निर्यात संवर्धन समिति (SEPC) और जिला-स्तरीय समितियों का गठन किया है। ये निकाय प्रयासों के समन्वय के लिए अधिकारियों, उद्योग संघों, बैंकरों और निर्यातकों को एक साथ लाते हैं।
  • जिला निर्यात कार्य योजनाएँ: 590 से अधिक जिलों के लिए मसौदा (draft) योजनाएँ तैयार की गई हैं, और लगभग 249 योजनाओं को औपचारिक रूप से अधिसूचित किया गया है। योजनाएँ प्राथमिकता वाले उत्पादों और सेवाओं, बुनियादी ढांचे की कमियों, रसद (logistics) जरूरतों और प्रशिक्षण आवश्यकताओं को सूचीबद्ध करती हैं।
  • उत्पाद की पहचान: प्रत्येक जिला निर्यात क्षमता वाले कुछ सामानों या सेवाओं की पहचान करता है। उदाहरणों में साबरकांठा और अरावली (गुजरात) में सिरेमिक टाइलें और खनिज, जलगांव (महाराष्ट्र) में केले और बैंगन, इंदौर और आगर मालवा (मध्य प्रदेश) में प्याज और संतरे, रायपुर (छत्तीसगढ़) जैसे जिलों में चावल, मक्का और आम, और झारखंड में बस्तर लौह शिल्प (iron craft), बांस उत्पाद और वनोपज जैसे हस्तशिल्प शामिल हैं।
  • क्षमता निर्माण: आउटरीच कार्यक्रम और कौशल विकास कार्यशालाएं किसानों, कारीगरों और उद्यमियों को गुणवत्ता मानकों, पैकेजिंग, ब्रांडिंग और अंतर्राष्ट्रीय विपणन (international marketing) में प्रशिक्षित करती हैं। ई-कॉमर्स पोर्टल और निर्यात संवर्धन परिषदों (export promotion councils) के साथ संबंध बनाए जाते हैं।
  • डेटा और मार्केट इंटेलिजेंस: पोर्टल niryat.gov.in जिले के निर्यात पर विस्तृत डेटा (granular data) प्रदान करता है और हितधारकों को प्रवृत्तियों (trends) और अवसरों को ट्रैक करने की अनुमति देता है।

महत्व

  • समावेशी विकास: छोटे उत्पादकों और MSMEs को सशक्त बनाकर, यह पहल व्यापार के लाभों को महानगरीय केंद्रों से परे फैलाती है। किसान और कारीगर विदेशी खरीदारों तक सीधे पहुंच प्राप्त करते हैं, जिससे उनकी आय में वृद्धि होती है।
  • निर्यात का विविधीकरण (Diversification): कृषि, विनिर्माण (manufacturing) और हस्तशिल्प उत्पादों की एक विस्तृत श्रृंखला निर्यात बास्केट में प्रवेश करती है, जिससे कुछ क्षेत्रों पर निर्भरता कम होती है।
  • स्थानीय ब्रांडिंग: जिला-विशिष्ट उत्पादों को ब्रांडिंग समर्थन प्राप्त होता है और, जहां लागू हो, भौगोलिक संकेत (GI) टैग प्राप्त होते हैं जो उनकी विशिष्ट पहचान और विरासत की रक्षा करते हैं।

स्रोत: PIB, Lok Sabha

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