चर्चा में क्यों?
2026 की शुरुआत में यूरोप के कुछ हिस्सों में खुरपका और मुंहपका रोग (Foot and Mouth Disease - FMD) के प्रकोप और भारत में चल रहे टीकाकरण अभियानों ने इस वायरल बीमारी की ओर ध्यान आकर्षित किया है, जो पशुधन (livestock) को नष्ट कर सकती है। FMD और भारत के नियंत्रण कार्यक्रम को समझना कृषि और पशुपालन के लिए महत्वपूर्ण है।
पृष्ठभूमि
खुरपका और मुंहपका रोग एक अत्यधिक संक्रामक वायरल बीमारी है जो गाय, भैंस, भेड़, बकरी और सूअर जैसे खुर वाले जानवरों (cloven-hoofed animals) को प्रभावित करती है। यह बीमारी Picornaviridae परिवार के एक Aphthovirus के कारण होती है और इसके सात सीरोटाइप (A, O, C, SAT1, SAT2, SAT3 और Asia1) हैं। यह तेजी से फैलता है, जिससे बुखार, मुंह और पैरों पर छाले, दूध की उपज और वृद्धि में कमी, बांझपन और कभी-कभी मृत्यु हो जाती है। विभिन्न सीरोटाइप क्रॉस-इम्युनिटी (cross-immunity) प्रदान नहीं करते हैं, इसलिए टीकों को स्थानीय उपभेदों (local strains) के अनुरूप बनाया जाना चाहिए।
भारत की प्रतिक्रिया
- राष्ट्रीय पशु रोग नियंत्रण कार्यक्रम (National Animal Disease Control Programme - NADCP): 2019 में शुरू की गई, इस प्रमुख योजना का उद्देश्य FMD के खिलाफ गाय, भैंस, भेड़, बकरी और सूअरों का 100% टीकाकरण करना है। इस कार्यक्रम का पांच साल (2019-20 से 2023-24) के लिए ₹13,343 करोड़ का परिव्यय है और 2025 तक FMD को नियंत्रित करने और 2030 तक इसे खत्म करने का लक्ष्य है।
- सामूहिक टीकाकरण: पशुधन का नियमित सामूहिक टीकाकरण (mass vaccination) FMD को नियंत्रित करने का सबसे प्रभावी तरीका है। शीघ्र पता लगाना, निगरानी और आवाजाही नियंत्रण (movement controls) टीकाकरण प्रयासों के पूरक हैं।
- लाभ: FMD को नियंत्रित करने से दूध उत्पादन में सुधार होता है, आर्थिक नुकसान कम होता है और भारत को अंतरराष्ट्रीय व्यापार मानकों को पूरा करने में मदद मिलती है।
महत्व
FMD का प्रकोप गंभीर आर्थिक नुकसान का कारण बन सकता है क्योंकि संक्रमित जानवर उत्पादकता खो देते हैं और उनके उत्पादों का निर्यात नहीं किया जा सकता है। भारत की बड़ी पशुधन आबादी सतर्कता को आवश्यक बनाती है। टीकाकरण अभियान न केवल पशुओं के स्वास्थ्य की रक्षा करते हैं बल्कि किसानों की आजीविका भी सुरक्षित करते हैं और खाद्य सुरक्षा को बढ़ाते हैं।
स्रोत: DD News