समाचार में क्यों?
Gond tribe (गोंड जनजाति) के लगभग 80 सदस्यों ने Earth Day 2026 के लिए बस्तर, छत्तीसगढ़ से दिल्ली की यात्रा की और एक सरल अपील की: पृथ्वी की रक्षा करें, विनाश को रोकें। उन्हें राजधानी में एक भाषाई संबंध भी मिला — कड़कड़डूमा (Karkarduma) इलाके का नाम एक गोंडी शब्द से लिया गया है जिसका अर्थ "पृथ्वी का रक्षक" होता है।
पृष्ठभूमि
गोंड (Gonds) भारत के सबसे बड़े स्वदेशी समुदायों में से एक हैं। उनकी आबादी मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और ओडिशा में केंद्रित है, जबकि कई अन्य राज्यों में छोटे समूह हैं। गोंडी भाषा द्रविड़ियन (Dravidian) परिवार से संबंधित है, हालांकि कई गोंड अब हिंदी या मराठी जैसी क्षेत्रीय भाषाएँ बोलते हैं। पारंपरिक रूप से, उनकी अर्थव्यवस्था कृषि, पशुपालन और वन उपज एकत्र करने के इर्द-गिर्द घूमती है। समुदाय पूर्वजों की पूजा के साथ-साथ कबीले और ग्राम देवताओं की पूजा करता है, और मडई (Madai) व केसलापुर जतरा (Keslapur Jathra) जैसे त्योहार महत्वपूर्ण सांस्कृतिक कार्यक्रम हैं।
Earth Day यात्रा और संदेश
- दिल्ली की यात्रा: कई प्रतिभागियों के लिए, यह राजधानी की उनकी पहली यात्रा थी। वे बस्तर से यह साझा करने के लिए गए थे कि इंसान ग्रह के रक्षक हैं, न कि इसके मालिक।
- सांस्कृतिक निरंतरता: गोंड विश्वदृष्टि (worldview) प्रकृति के साथ सद्भाव में रहने पर ज़ोर देती है। 1970 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा Earth Day बनाए जाने से बहुत पहले, गोंड लोगों ने आजीविका के लिए पृथ्वी को धन्यवाद देने वाले अनुष्ठानों को चिह्नित किया था।
- शहरी संबंध: समूह ने कड़कड़डूमा का दौरा किया और गोंडी में इसकी भाषाई जड़ों को नोट किया, जो प्रतीकात्मक रूप से उनकी पैतृक परंपराओं को आधुनिक शहर से जोड़ता है।
निष्कर्ष
गोंड जनजाति की Earth Day पहल हमें याद दिलाती है कि स्वदेशी ज्ञान और सांस्कृतिक मूल्य पर्यावरण प्रबंधन (environmental stewardship) का मार्गदर्शन कर सकते हैं। आदिवासी अधिकारों का सम्मान करना और उनके संदेशों को सुनना एक स्थायी भविष्य के निर्माण के लिए आवश्यक है।
स्रोत: Down To Earth