चर्चा में क्यों?
केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री (Union Minister of Environment, Forest and Climate Change) ने घोषणा की कि राजस्थान के जैसलमेर में कंजर्वेशन ब्रीडिंग सेंटर (Conservation Breeding Centre) में ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के दो नए चूजे (chicks) पैदा हुए हैं। यह प्रोजेक्ट ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (Project Great Indian Bustard) के चौथे वर्ष में एक मील का पत्थर है।
पृष्ठभूमि
ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (आर्डियोटिस नाइग्रिसेप्स - Ardeotis nigriceps) भारतीय उपमहाद्वीप (Indian subcontinent) के लिए स्थानिक जमीन पर रहने वाला एक बड़ा पक्षी है। कभी पश्चिमी और मध्य भारत के अर्ध-शुष्क घास के मैदानों (semi-arid grasslands) में प्रचुर मात्रा में पाए जाने वाले इस पक्षी की संख्या निवास स्थान के नुकसान, शिकार और बिजली लाइनों के टकराव (power-line collisions) के कारण तेजी से घटी है। इस प्रजाति को IUCN रेड लिस्ट में गंभीर रूप से लुप्तप्राय (Critically Endangered) के रूप में सूचीबद्ध किया गया है, वन्यजीवों और वनस्पतियों की लुप्तप्राय प्रजातियों में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर कन्वेंशन (CITES) के परिशिष्ट I (Appendix I) में शामिल किया गया है और भारत के वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची I (Schedule I) के तहत संरक्षित किया गया है।
प्रोजेक्ट ग्रेट इंडियन बस्टर्ड
- 2020 में शुरू किया गया यह प्रोजेक्ट भारतीय वन्यजीव संस्थान (Wildlife Institute of India), राजस्थान वन विभाग और केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय का एक सहयोगी प्रयास है, जिसका उद्देश्य बस्टर्ड्स को कैद में पालना (breed in captivity) और उन्हें सुरक्षित आवासों में छोड़ना (release) है।
- जैसलमेर में सैम (Sam) के पास स्थित ब्रीडिंग सेंटर (breeding centre) जंगल से एकत्र किए गए वयस्क पक्षियों को रखता है। अंडों को इनक्यूबेट (incubated) किया जाता है और शिकारियों (predation) और अन्य खतरों को कम करने के लिए प्रशिक्षित कर्मचारियों द्वारा चूजों को हाथ से पाला जाता है।
- दो नए चूजों के जन्म के साथ - एक प्राकृतिक संभोग (natural mating) से और दूसरा कृत्रिम गर्भाधान (artificial insemination) के माध्यम से - कैप्टिव आबादी लगभग सत्तर तक पहुंच गई है। कुछ पुराने पक्षियों को निर्दिष्ट सुरक्षित क्षेत्रों में छोड़ने की योजना चल रही है।
महत्व
- ब्रीडिंग प्रोग्राम की सफलता विलुप्त होने (extinction) के कगार पर मौजूद एक प्रजाति के लिए आशा प्रदान करती है। कैप्टिव-पले पक्षी मुख्य रूप से राजस्थान के थार मरुस्थल (Thar Desert) में जीवित रहने वाली छोटी जंगली आबादी (wild population) को बढ़ाने में मदद कर सकते हैं।
- यह परियोजना प्राकृतिक घास के मैदानों (natural grasslands) की रक्षा और उन्हें बहाल करने (restore), बिजली की लाइनों (power lines) को हटाने या चिह्नित करने (mark) और संरक्षण (conservation) में स्थानीय समुदायों को शामिल करने की आवश्यकता पर भी प्रकाश डालती है।
- बस्टर्ड पारिस्थितिकी (ecology), आनुवंशिक विविधता (genetic diversity) और पुनरुत्पादन तकनीकों (reintroduction techniques) में निरंतर शोध प्रजाति की दीर्घकालिक व्यवहार्यता (viability) को निर्धारित करेगा।
निष्कर्ष
प्रोजेक्ट ग्रेट इंडियन बस्टर्ड की नवीनतम सफलता भारत के सबसे प्रतिष्ठित पक्षियों में से एक को बचाने की दिशा में एक उत्साहजनक कदम है। भविष्य की पीढ़ियां खुले घास के मैदानों में बस्टर्ड को चलते हुए देख सकें, यह सुनिश्चित करने के लिए कैद और जंगल दोनों में निरंतर संरक्षण उपाय (conservation measures) आवश्यक हैं।
स्रोत: Press Information Bureau