कला एवं संस्कृति

Jharkhand Crafts: रेशम, आभूषण और बांस के लिए GI टैग

Jharkhand Crafts: रेशम, आभूषण और बांस के लिए GI टैग

चर्चा में क्यों?

जून 2026 में झारखंड के चार पारंपरिक उत्पादों - भगैया सिल्क (Bhagaiya silk), कुचाई सिल्क (Kuchai silk), मुंडा आभूषण (Munda jewellery) और बांस शिल्प (bamboo craft) को भौगोलिक संकेत (Geographical Indication - GI) का दर्जा मिला। इस मान्यता का उद्देश्य इन हस्तशिल्पों (handicrafts) के अनूठे गुणों की रक्षा करना और स्थानीय कारीगरों (artisans) की आजीविका को बढ़ावा देना है。

पृष्ठभूमि

भौगोलिक संकेत एक ऐसा चिह्न है जिसका उपयोग उन उत्पादों पर किया जाता है जिनका एक विशिष्ट भौगोलिक मूल (geographical origin) होता है और जिनमें उस स्थान से जुड़े गुण या प्रतिष्ठा होती है। जीआई टैग (GI tag) उत्पाद के नाम के अनधिकृत उपयोग को रोकने में मदद करता है और बाजार मूल्य बढ़ाता है। झारखंड के ये चार उत्पाद जीआई व्यवस्था के तहत संरक्षित भारतीय हस्तशिल्प, खाद्य पदार्थ और वस्त्रों की बढ़ती सूची में शामिल हो गए हैं。

नए जीआई उत्पादों के बारे में

  • भगैया सिल्क (Bhagaiya silk): संथाल (Santhal) आदिवासी महिलाओं द्वारा बुना गया हाथ से काता हुआ रेशमी कपड़ा। यह रेशम जंगली टसर कोकून (wild tussar cocoons) से बनाया जाता है और इसमें प्राकृतिक सुनहरी चमक होती है। कारीगरों की पीढ़ियों ने इस पर्यावरण-अनुकूल (eco‑friendly) शिल्प को संरक्षित किया है।
  • कुचाई सिल्क (Kuchai silk): कुचाई गांव में आसन (Asan) और अर्जुन (Arjun) के पेड़ों पर पाला जाने वाला टसर सिल्क, जो अब पूरे राज्य में फैल गया है। यह परंपरा ग्रामीण क्षेत्रों में आजीविका प्रदान करती है और अपनी खुरदरी बनावट (coarse texture) तथा मिट्टी के रंगों (earthy colours) के लिए जानी जाती है।
  • मुंडा आभूषण (Munda jewellery): मुंडा आदिवासी समुदाय द्वारा बनाए गए सजावटी आभूषण (Ornamental pieces)। विशिष्ट रूपांकनों (motifs) और शिल्प कौशल वाले ये आभूषण मध्य भारत की सांस्कृतिक विरासत (cultural heritage) को दर्शाते हैं और इनमें चांदी, तांबा और पीतल जैसी धातुओं का उपयोग किया जाता है।
  • बांस शिल्प (Bamboo craft): कारीगर स्थानीय रूप से उपलब्ध बांस को टोकरी, चटाई और सजावटी वस्तुओं में बदलते हैं। यह शिल्प रचनात्मकता को टिकाऊ संसाधन उपयोग के साथ जोड़ता है और आदिवासी गांवों में आय का एक महत्वपूर्ण स्रोत है।

जीआई टैग का महत्त्व

  • संरक्षण (Protection): जीआई का दर्जा बाहरी लोगों द्वारा उत्पाद के नामों के दुरुपयोग को रोकता है और यह सुनिश्चित करता है कि केवल अधिकृत निर्माता ही इन नामों के तहत माल का विपणन कर सकते हैं।
  • आर्थिक लाभ: टैग कारीगरों को बेहतर मूल्य प्राप्त करने, नए बाज़ारों तक पहुंचने और पर्यटकों को आकर्षित करने में मदद कर सकता है, जिससे ग्रामीण आजीविका में सुधार होता है।
  • विरासत का संरक्षण: यह मान्यता युवा पीढ़ियों को पारंपरिक कौशल सीखने के लिए प्रोत्साहित करती है और सांस्कृतिक प्रथाओं को नष्ट होने से बचाने में मदद करती है।

निष्कर्ष

भगैया सिल्क, कुचाई सिल्क, मुंडा आभूषण और बांस शिल्प के लिए जीआई मान्यता झारखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का जश्न मनाती है और इसके कारीगर समुदायों का समर्थन करती है। स्वदेशी ज्ञान और शिल्प कौशल को महत्व देकर, जीआई टैग समावेशी विकास (inclusive development) और सांस्कृतिक गौरव को बढ़ावा देता है。

स्रोत: New Indian Express
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