पर्यावरण

Keelback Snakes Northeast: हर्पेटोरियस डेविडी, हेबियस गिल्होडेसी और नैट्रिसिडे

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समाचार में क्यों?

भारतीय वन्यजीव संस्थान (Wildlife Institute of India) के सरीसृप विज्ञानियों (Herpetologists) ने पहली बार भारत में कीलबैक (keelback) सांपों की दो प्रजातियों की सूचना दी है। Rakhine Keelback (Herpetoreas davidi) और Kachin Hills Keelback (Hebius gilhodesi) को क्रमशः मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश में प्रलेखित किया गया था। अब तक ये नैट्रिसिन (natricine) सांप केवल म्यांमार से ही ज्ञात थे, इसलिए इनकी खोज इनकी ज्ञात सीमा का विस्तार करती है और भारत के पूर्वोत्तर जंगलों की जैव विविधता को रेखांकित करती है।

पृष्ठभूमि

कीलबैक (Keelbacks) गैर-विषैले सांप हैं जो Natricidae परिवार से संबंधित हैं। उनका नाम उनकी पीठ पर चलने वाले कील्ड (धब्बेदार) शल्क (scales) के नाम पर रखा गया है और ये अक्सर झरनों, धान के खेतों और अन्य गीले आवासों के पास पाए जाते हैं। नई दर्ज की गई प्रजातियों के बारे में मुख्य विवरण में शामिल हैं:

  • Rakhine Keelback (Herpetoreas davidi): पहले यह माना जाता था कि यह प्रजाति केवल म्यांमार के रखाइन राज्य (Rakhine State) में ही रहती है, लेकिन इसे मिजोरम के नगेंगपुई वन्यजीव अभयारण्य (Ngengpui Wildlife Sanctuary) में पाया गया। इस खोज ने इसकी ज्ञात सीमा को लगभग 577 किलोमीटर तक बढ़ा दिया है।
  • Kachin Hills Keelback (Hebius gilhodesi): पहले यह केवल काचिन हिल्स (Kachin Hills) से ही ज्ञात था, अब इसे अरुणाचल प्रदेश के नामदाफा राष्ट्रीय उद्यान (Namdapha National Park) और कमलांग टाइगर रिजर्व (Kamlang Tiger Reserve) में दर्ज किया गया है। सीमा विस्तार लगभग 107 किलोमीटर है।

क्षेत्रीय अवलोकनों, आकारिकी (morphological) मापों और माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए (mitochondrial DNA) विश्लेषण के संयोजन के माध्यम से इन सांपों की पहचान की गई। दोनों प्रजातियां मध्यम आकार की, अर्ध-जलीय और मनुष्यों के लिए हानिरहित हैं। भारत में इनकी उपस्थिति इंगित करती है कि पूर्वी हिमालय जैव विविधता हॉटस्पॉट में ऐसे कई और गैर-दस्तावेजीकृत सरीसृप हो सकते हैं।

खोज का महत्व

  • जैव विविधता की मैपिंग: अपनी पहले से ज्ञात सीमाओं के बाहर प्रजातियों को रिकॉर्ड करना वैज्ञानिकों को वितरण मानचित्रों को परिष्कृत करने और राजनीतिक सीमाओं के पार पारिस्थितिक संबंधों को समझने में मदद करता है।
  • संरक्षण योजना: इन सांपों की उपस्थिति मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश में जंगलों और आर्द्रभूमि (wetlands) की रक्षा करने की आवश्यकता का समर्थन करती है। ऐसी दुर्लभ प्रजातियों की सुरक्षा के लिए वन्यजीव अभयारण्यों और राष्ट्रीय उद्यानों का प्रभावी प्रबंधन आवश्यक है।
  • वैज्ञानिक अंतर्दृष्टि: नए आकारिकी विवरण और आनुवंशिक डेटा (genetic data) निकट से संबंधित प्रजातियों को अलग करने में सहायता करते हैं और नैट्रिसिन समूह के वर्गीकरण (taxonomy) में सुधार करते हैं।

निष्कर्ष

भारत में Rakhine और Kachin Hills कीलबैक की फिर से खोज इस बात पर जोर देती है कि पूर्वोत्तर अभी भी कितना कम-अन्वेषित (under-explored) है। निरंतर सर्वेक्षण और आवास संरक्षण संभवतः अधिक छिपी हुई प्रजातियों को उजागर करेगा, जो जैव विविधता के लिए इस क्षेत्र के वैश्विक महत्व को उजागर करता है।

स्रोत: BioPatrika

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