चर्चा में क्यों?
पर्यावरण कार्यकर्ताओं और शोधकर्ताओं ने मार्च 2026 में आंध्र प्रदेश में भारत के सबसे बड़े मीठे पानी के वेटलैंड्स (wetlands) में से एक, कोलेरू झील (Kolleru Lake) के सिकुड़ने पर अलार्म बजाया। उन्होंने चेतावनी दी कि विस्तृत मछली और झींगा फार्मों (fish and shrimp farms) ने लेक बेड (lakebed) के अधिकांश हिस्से पर कब्जा कर लिया है, जिससे थोड़ा खुला पानी रह गया है और प्रवासी पक्षियों तथा स्थानीय आजीविका को खतरा है। अतिक्रमण के खिलाफ सख्त कार्रवाई और झील के प्राकृतिक जल विज्ञान की बहाली की अपील की गई।
पृष्ठभूमि
कोलेरू झील कृष्णा और गोदावरी नदियों के डेल्टा के बीच स्थित है। ऐतिहासिक रूप से लगभग 90,100 हेक्टेयर (222,600 एकड़) में फैली यह झील एक प्राकृतिक बाढ़ जलाशय (natural flood reservoir) के रूप में कार्य करती है, बुडामेरू (Budameru) और तमिलेरू (Tammileru) नदियों से पानी प्राप्त करती है और उप्पुतेरु (Upputeru) चैनल के माध्यम से बंगाल की खाड़ी में गिरती है। 1999 में इसे वन्यजीव अभयारण्य और 2002 में अंतरराष्ट्रीय महत्व का रामसर आर्द्रभूमि (Ramsar wetland) घोषित किया गया था। यह झील स्पॉट-बिल्ड पेलिकन (spot‑billed pelicans), एशियन ओपनबिल (Asian openbills) और राजहंस (flamingos) जैसे प्रवासी पक्षियों की मेजबानी करती है।
झील का पतन
- एक्वाकल्चर बूम: 1980 के दशक के उत्तरार्ध से, झील के अंदर और आसपास हजारों कार्प (carp) और झींगा तालाब खोदे गए हैं, जो अक्सर अवैध होते हैं। कार्यकर्ताओं का अनुमान है कि लगभग 128,000 एकड़ लेक बेड अब जलकृषि (aquaculture) के अधीन है, जिससे खुला पानी काफी कम हो गया है।
- अतिक्रमण और प्रदूषण: मछली फार्मों के अलावा, धान के खेत, सड़कें और बस्तियाँ आर्द्रभूमि (wetland) पर अतिक्रमण करती हैं। तालाबों से पोषक तत्वों से भरपूर अपशिष्ट (effluents) और उर्वरकों का अपवाह सुपोषण (eutrophication), शैवाल के खिलने (algal blooms) और मछलियों के मरने का कारण बनता है।
- ऑपरेशन कोलेरू: 2006 में आंध्र प्रदेश सरकार ने अवैध मछली तालाबों को ध्वस्त करने का अभियान चलाया था, लेकिन कई को फिर से बना लिया गया। प्रवर्तन (Enforcement) छिटपुट रहा है, और संरक्षण तथा आजीविका के बीच संघर्ष बना हुआ है।
- हाइड्रोलॉजिकल परिवर्तन: प्राकृतिक चैनलों और बांधों के संकुचित होने और अवरुद्ध होने से पानी के प्रवाह में बाधा उत्पन्न हुई है। यह झील अब केवल मानसून के महीनों के दौरान ही मौजूद रहती है; यह गर्मियों में सूख जाती है, जिससे पक्षियों को उनके आवास से वंचित होना पड़ता है।
कोलेरू क्यों मायने रखता है
- जैव विविधता हॉटस्पॉट: यह झील मध्य एशियाई फ्लाईवे (Central Asian Flyway) पर प्रवासी जलपक्षियों (waterbirds) के लिए एक महत्वपूर्ण ठहराव है। इसके पतन से उन प्रजातियों को खतरा है जो भोजन और प्रजनन के लिए इस पर निर्भर हैं।
- प्राकृतिक बाढ़ बफर: कृष्णा और गोदावरी प्रणालियों से बाढ़ के पानी को अवशोषित करके, कोलेरू निचले इलाकों में बाढ़ के जोखिम को कम करता है। वेटलैंड क्षेत्र का सिकुड़ना इस सुरक्षात्मक कार्य को कमजोर करता है।
- आजीविका: झील के आसपास के पारंपरिक मछुआरे और किसान इसके संसाधनों पर निर्भर हैं। गिरावट से कुछ बड़े एक्वाकल्चर ऑपरेटरों को लाभ होता है जबकि छोटे पैमाने की आजीविका को नुकसान पहुंचता है।
निष्कर्ष
कोलेरू झील को बचाने का आह्वान इस बात पर जोर देता है कि आर्द्रभूमि संरक्षण में पारिस्थितिक स्वास्थ्य और मानवीय आवश्यकताओं को संतुलित करना चाहिए। पक्षियों, लोगों और जलवायु लचीलेपन (climate resilience) के लिए इस कभी-विशाल झील को पुनर्जीवित करने के लिए पानी के प्रवाह को बहाल करना, अतिक्रमण को हटाना और प्रदूषण नियंत्रण लागू करना आवश्यक है।
स्रोत: The Hindu