अर्थव्यवस्था

NMSA: संधारणीय कृषि, PDMC और मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन

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चर्चा में क्यों?

कृषि मंत्रालय ने हाल ही में 9 मई 2026 को जारी एक पृष्ठभूमि पत्र (background paper) में सतत कृषि के लिए राष्ट्रीय मिशन (NMSA) की उपलब्धियों पर प्रकाश डाला। दस्तावेज़ में मिशन के विभिन्न घटकों के तहत प्रगति का विवरण दिया गया है और 2025-30 की अवधि के दौरान सूक्ष्म सिंचाई (micro‑irrigation) और जलवायु-अनुकूल कृषि पद्धतियों (climate‑resilient farming practices) के विस्तार के लिए नए लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं。

पृष्ठभूमि

जलवायु परिवर्तन पर भारत की राष्ट्रीय कार्य योजना (National Action Plan on Climate Change) के हिस्से के रूप में 2014-15 में शुरू किया गया NMSA, खेती को जलवायु परिवर्तनशीलता के प्रति अधिक लचीला बनाने और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण का प्रयास करता है। 2018-19 से इसने हरित क्रांति-कृषोन्नति योजना (Green Revolution–Krishonnati Yojana) के तहत एक उप-मिशन के रूप में कार्य किया और बाद में इसे प्रधान मंत्री राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (Pradhan Mantri Rashtriya Krishi Vikas Yojana) में मिला दिया गया। मिशन तीन स्तंभों पर केंद्रित है: वर्षा आधारित भूमि पर एकीकृत खेती (integrated farming), सूक्ष्म सिंचाई के माध्यम से कुशल जल उपयोग और मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन (soil health management)। यह जीरो हंगर (zero hunger), स्वच्छ जल और जलवायु कार्रवाई जैसे सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) के साथ संरेखित है。

मुख्य घटक और हालिया उपलब्धियां

  • वर्षा सिंचित क्षेत्र विकास (Rainfed Area Development - RAD): बागवानी, पशुधन और मत्स्य पालन के साथ फसलों को मिलाकर कृषि-जलवायु क्षेत्र-विशिष्ट (agro‑climatic zone‑specific) एकीकृत कृषि प्रणालियों को बढ़ावा देता है। 2014-15 से लगभग ₹2,119.84 करोड़ जारी किए गए हैं, जो 8.5 लाख हेक्टेयर को कवर करते हैं और 14 लाख से अधिक किसानों को लाभान्वित करते हैं। 2025-26 में सरकार ने इस घटक के लिए ₹343.86 करोड़ आवंटित किए, और 96,000 से अधिक किसानों ने प्रशिक्षण प्राप्त किया।
  • प्रति बूंद अधिक फसल (Per Drop More Crop - PDMC): जल-उपयोग दक्षता को अधिकतम करने के लिए ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई को प्रोत्साहित करता है। 2015-16 से केंद्र की ₹26,325 करोड़ की सहायता से लगभग 109 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को सूक्ष्म सिंचाई के अंतर्गत लाया गया है। एक नया लक्ष्य 2025 और 2030 के बीच अतिरिक्त 100 लाख हेक्टेयर को कवर करने का प्रयास करता है।
  • मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन (Soil Health Management - SHM): मृदा-परीक्षण प्रयोगशालाओं (soil‑testing laboratories) का समर्थन करता है, पोषक तत्वों के संतुलित उपयोग को बढ़ावा देता है और जैविक खेती की वकालत करता है। 2025-26 में लगभग 97.5 लाख मिट्टी के नमूने एकत्र किए गए और लगभग 92.9 लाख का परीक्षण किया गया। 2015 के बाद से इस कार्यक्रम ने उर्वरक के उपयोग पर किसानों का मार्गदर्शन करने के लिए 25 करोड़ से अधिक मृदा स्वास्थ्य कार्ड (Soil Health Cards) तैयार किए हैं।
  • मृदा उर्वरता मानचित्रण (Soil fertility mapping): भारतीय मृदा और भूमि उपयोग सर्वेक्षण (Soil and Land Use Survey of India) चयनित मॉडल गांवों में ग्राम-स्तरीय उर्वरता मानचित्र (fertility maps) तैयार कर रहा है ताकि किसान स्थान-विशिष्ट (site‑specific) पोषक तत्वों के निर्णय ले सकें। 2,000 से अधिक गांवों के लिए मानचित्र पूरे कर लिए गए हैं, और जानकारी सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित की जाती है।
  • जलवायु-लचीला अनुसंधान (Climate‑resilient research): भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) जलवायु अनुकूल कृषि पर राष्ट्रीय नवाचार (NICRA) परियोजना चलाती है। 651 जिलों में भेद्यता आकलन (Vulnerability assessments) ने 310 को अत्यधिक संवेदनशील (highly vulnerable) के रूप में पहचाना है। सूखा-सहिष्णु (drought‑tolerant) फसलों, शून्य-जुताई (zero‑till) खेती और अन्य अनुकूली प्रथाओं को प्रदर्शित करने के लिए 448 स्थानों पर जलवायु-लचीले गांव (Climate‑resilient villages) स्थापित किए गए हैं। 2014 और 2025 के बीच लगभग 3,000 जलवायु-लचीली फसल की किस्में जारी की गईं।

स्रोत

PIB

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