Art and Culture

Nowruz Festival: पारसी नव वर्ष, पारसी धर्म और अमूर्त सांस्कृतिक विरासत

Nowruz Festival: पारसी नव वर्ष, पारसी धर्म और अमूर्त सांस्कृतिक विरासत

चर्चा में क्यों?

21 मार्च 2026 को भारत और दुनिया भर में पारसी समुदायों ने नवरोज़ (Navroz) या फ़ारसी नव वर्ष मनाया। यूनेस्को (UNESCO) नौरूज़ (Nowruz) को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत (Intangible Cultural Heritage of Humanity) के रूप में मान्यता देता है, और संयुक्त राष्ट्र इस दिन को अंतर्राष्ट्रीय नौरूज़ दिवस (International Nowruz Day) के रूप में मनाता है।

पृष्ठभूमि

नवरोज़ का शाब्दिक अर्थ फ़ारसी में "नया दिन" है और इसकी जड़ें प्राचीन फारस (Persia) के पारसी धर्म (Zoroastrian religion) से जुड़ी हैं। यह त्योहार वसंत विषुव (spring equinox) पर मनाया जाता है (आमतौर पर 20 या 21 मार्च), जो प्रकृति के पुनर्जन्म का प्रतीक है। इसकी उत्पत्ति महान राजा जमशेद (king Jamshid) से जुड़ी है, जिनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने सौर कैलेंडर (solar calendar) की शुरुआत की थी। सदियों से नौरूज़ ईरान से मध्य एशिया, काकेशस (Caucasus), तुर्की और भारतीय उपमहाद्वीप के कुछ हिस्सों में फैल गया।

परंपराएं

  • हफ़्त-सीन मेज़ (Haft-sin table): परिवार फ़ारसी अक्षर सीन (sin) से शुरू होने वाली सात वस्तुओं के साथ एक उत्सवी मेज़ (festive table) लगाते हैं (जैसे, पुनर्जन्म के लिए गेहूं के अंकुर, सुंदरता के लिए सेब, स्वास्थ्य के लिए लहसुन)। दर्पण, मोमबत्तियाँ और सुनहरी मछली (goldfish) आत्म-प्रतिबिंब (self-reflection), प्रकाश और जीवन का प्रतीक हैं।
  • घर की सफाई और प्रार्थना: घरों को अच्छी तरह से साफ किया जाता है और लोग नए कपड़े पहनते हैं। भारत में पारसी लोग (Zoroastrian Parsis) समृद्धि की प्रार्थना करने के लिए अग्नि मंदिरों (fire temples) में जाते हैं और पवित्र अग्नि (sacred fire) में चंदन (sandalwood) चढ़ाते हैं।
  • पारिवारिक भोजन: रावो (ravo), सेव (sev), पात्रा-नी-मच्छी (पत्तों में लिपटी मछली) और साली-बोटी (आलू के डंठल के साथ मांस) जैसे विशेष व्यंजन तैयार किए जाते हैं। पटेती (Pateti), शहंशाही कैलेंडर के तहत कुछ महीनों बाद मनाया जाता है, जिसमें पश्चाताप (penitence) और क्षमा (forgiveness) शामिल है।

महत्व

पश्चिम और दक्षिण एशिया में 300 मिलियन से अधिक लोगों के लिए, नौरूज़ नवीनीकरण (renewal) और आशा (hope) का प्रतीक है। भारत में यह त्योहार पारसी समुदाय के समृद्ध सांस्कृतिक योगदान को उजागर करता है और "अच्छे विचार, अच्छे शब्द, अच्छे कर्म" ("good thoughts, good words, good deeds") के मूल्यों को प्रोत्साहित करता है। नौरूज़ को अपनी विरासत सूची में शामिल करके, यूनेस्को उन साझा परंपराओं (shared traditions) को मान्यता देता है जो विविध समाजों (diverse societies) को बांधती हैं।

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