विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

Pyroprocessing: परमाणु ईंधन रीसाइक्लिंग, PFBR और Three-Stage Nuclear Programme

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चर्चा में क्यों?

भारत का परमाणु ऊर्जा विभाग (Department of Atomic Energy) परमाणु ईंधन चक्र (nuclear fuel cycle) को बंद करने (closing) के लिए उन्नत तकनीकों (advanced technologies) की खोज जारी रखे हुए है। ऐसी ही एक तकनीक, पायरोप्रोसेसिंग (pyroprocessing), ने फास्ट ब्रीडर रिएक्टरों (fast breeder reactors) से खर्च हुए ईंधन को रीप्रोसेस (reprocess) करने के एक तरीके के रूप में ध्यान आकर्षित किया है। संयुक्त राज्य अमेरिका में आर्गन नेशनल लेबोरेटरी (Argonne National Laboratory) में किए गए शोध और भारत के त्रि-चरणीय परमाणु कार्यक्रम (three-stage nuclear programme) के लिए इसकी प्रासंगिकता पर अंतर्राष्ट्रीय रिपोर्टों के बाद इस विषय को प्रमुखता मिली。

पृष्ठभूमि

पारंपरिक रीप्रोसेसिंग (traditional reprocessing) में खर्च हुए यूरेनियम ईंधन को एसिड में घोला जाता है और प्लूटोनियम एवं यूरेनियम को अलग करने के लिए सॉल्वेंट एक्सट्रैक्शन (solvent extraction) का उपयोग किया जाता है। इसके विपरीत, पायरोप्रोसेसिंग एक इलेक्ट्रोमेटलर्जिकल तकनीक है जो उच्च तापमान (high temperatures) पर काम करती है। खर्च हुए ऑक्साइड ईंधन को सबसे पहले लगभग 650°C पर पिघले हुए लिथियम क्लोराइड में धातु (metal) में बदला जाता है। इसके बाद धातु ईंधन को इलेक्ट्रो-रिफाइनिंग सेल (electro-refining cell) में रखा जाता है, जहाँ बिजली यूरेनियम और ट्रांसयूरेनिक (transuranic) तत्वों को कैथोड पर जमा करती है, जबकि विखंडन उत्पाद (fission products) नमक में ही रह जाते हैं। अंततः, यूरेनियम और एक्टिनाइड्स (actinides) को समेकित किया जाता है और फास्ट रिएक्टरों के लिए नए धातु ईंधन (metallic fuel) में निर्मित किया जाता है。

यह महत्वपूर्ण क्यों है

  • छोटे संयंत्र: पायरोप्रोसेसिंग सुविधाएँ कॉम्पैक्ट (compact) हो सकती हैं क्योंकि वे भारी तरल कचरे के बजाय धातुओं को संभालती हैं। पिघला हुआ नमक (molten salts) और उच्च तापमान तेज़ प्रतिक्रियाओं की अनुमति देते हैं और बड़ी मात्रा में एसिड की आवश्यकता को समाप्त करते हैं।
  • प्रसार प्रतिरोध (Proliferation resistance): पुनर्चक्रित ईंधन यूरेनियम, प्लूटोनियम और माइनर एक्टिनाइड्स का मिश्रण होता है। चूँकि यह स्व-विकिरणकारी (self-radiating) और विषैला बना रहता है, इसलिए यह डायवर्जन (diversion) या हथियारों के निर्माण के लिए कम आकर्षक होता है।
  • फास्ट रिएक्टरों के साथ अनुकूलता: भारत का 500 मेगावाट का प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) मिक्स्ड ऑक्साइड ईंधन (mixed oxide fuel) का उपयोग करता है और खपत से अधिक प्लूटोनियम का उत्पादन करेगा। पायरोप्रोसेसिंग त्रि-चरणीय कार्यक्रम के दूसरे चरण को बनाए रखने के लिए इस ईंधन के पुनर्चक्रण को सक्षम कर सकती है।
  • कचरे में कमी: विखंडन उत्पादों से लंबे समय तक जीवित रहने वाले एक्टिनाइड्स (long-lived actinides) को अलग करके, यह तकनीक भूगर्भीय निपटान (geological disposal) की आवश्यकता वाले उच्च-स्तरीय कचरे (high-level waste) की मात्रा और रेडियोटॉक्सिसिटी को कम कर सकती है।
  • विकास की स्थिति: पायरोप्रोसेसिंग अभी भी अनुसंधान के चरण में है। आर्गन नेशनल लेबोरेटरी ने 1990 के दशक में इंटीग्रल फास्ट रिएक्टर प्रोजेक्ट (integral fast reactor project) के लिए यह तकनीक विकसित की थी, और दक्षिण कोरिया तथा जापान भी पायलट संयंत्र स्थापित कर रहे हैं। भारत का भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (Bhabha Atomic Research Centre) भारतीय ईंधनों के लिए इस प्रक्रिया को अनुकूलित करने के लिए प्रयोग कर रहा है।

निष्कर्ष

पायरोप्रोसेसिंग परमाणु ईंधन चक्र को बंद करने और भारत की फास्ट रिएक्टर महत्वाकांक्षाओं का समर्थन करने के लिए एक आशाजनक मार्ग प्रदान करती है। हालाँकि, उच्च तापमान और प्रतिक्रियाशील पिघले हुए लवणों (reactive molten salts) के कारण इस तकनीक में कड़े सुरक्षा उपायों (stringent safety measures) की आवश्यकता होती है। व्यावसायिक तैनाती (commercial deployment) से पहले निरंतर अनुसंधान, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और विनियामक निगरानी (regulatory oversight) आवश्यक होगी。

स्रोत

The Hindu

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