भूगोल

River Basin Management Scheme: एकीकृत जल योजना और CWC

River Basin Management Scheme: एकीकृत जल योजना और CWC

चर्चा में क्यों?

जल शक्ति मंत्रालय (Ministry of Jal Shakti) ने 2026-27 से 2030-31 तक अगले वित्त आयोग (Finance Commission) चक्र के लिए नदी बेसिन प्रबंधन (River Basin Management - RBM) योजना को जारी रखने का प्रस्ताव दिया है। इस योजना को पूरी तरह से वित्तपोषित (fully funded) लगभग ₹2,183 करोड़ का परिव्यय प्राप्त होगा, जो वर्तमान अवधि में ₹1,276 करोड़ से अधिक है। यह भारत के प्रमुख नदी घाटियों (river basins) में एकीकृत जल-संसाधन योजना (integrated water‑resource planning) को मजबूत करना चाहता है, जिसमें अविकसित (underdeveloped) लेकिन पानी से भरपूर क्षेत्रों (water‑rich regions) पर विशेष ध्यान दिया गया है।

पृष्ठभूमि

भारत की नदी घाटियाँ करोड़ों लोगों के लिए सिंचाई (irrigation), जलविद्युत उत्पादन (hydropower generation), पीने के पानी की आपूर्ति (drinking water supply) और पारिस्थितिक सेवाओं (ecological services) का समर्थन करती हैं। इन घाटियों (basins) के प्रबंधन के लिए राज्यों और क्षेत्रों के बीच समन्वय की आवश्यकता है। RBM योजना, जिसे पहली बार 2021-26 के लिए अनुमोदित किया गया था, का उद्देश्य बहुउद्देशीय परियोजनाओं (multipurpose projects) के लिए मास्टर प्लान और प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार करना है जो सिंचाई, बाढ़ नियंत्रण (flood control) और बिजली उत्पादन (power generation) को संतुलित करते हैं। यह कार्यक्रम केंद्रीय जल आयोग (Central Water Commission), ब्रह्मपुत्र बोर्ड (Brahmaputra Board) और राष्ट्रीय जल विकास एजेंसी (National Water Development Agency) के माध्यम से कार्यान्वित किया जाता है।

प्रमुख घटक

  • सुविधाओं से वंचित बेसिन पर ध्यान (Focus on underserved basins): यह योजना उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में जल-समृद्ध लेकिन आर्थिक रूप से पिछड़े घाटियों को प्राथमिकता देती है, जैसे कि ब्रह्मपुत्र (Brahmaputra), बराक (Barak) और तीस्ता (Teesta), साथ ही जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में सिंधु बेसिन (Indus basin)।
  • क्षमता निर्माण (Capacity building): यह सिक्किम, मिजोरम, मणिपुर और नागालैंड जैसे राज्यों में प्रशिक्षण, कार्यशालाओं और डेटा-संग्रह प्रणालियों (data‑collection systems) के वित्तपोषण (funding) के माध्यम से तकनीकी और संस्थागत क्षमता में कमियों को दूर करता है।
  • सर्वेक्षण और मास्टर प्लान (Surveys and master plans): आधुनिक उपकरणों—GIS, रिमोट सेंसिंग (remote sensing), LiDAR और ड्रोन मैपिंग—का उपयोग करके व्यापक सर्वेक्षण बहुउद्देशीय बुनियादी ढांचे के लिए बेसिन-स्तरीय योजनाओं, विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (detailed project reports) और पूर्व-व्यवहार्यता अध्ययन (pre‑feasibility studies) को सूचित करेंगे।
  • बाढ़ प्रबंधन और जल निकासी (Flood management and drainage): यह योजना आपदा जोखिमों (disaster risks) को कम करने के लिए बाढ़ का पूर्वानुमान (flood forecasting), नदी तट संरक्षण (riverbank protection), स्प्रिंग-शेड प्रबंधन (spring‑shed management) और जल निकासी (drainage) हस्तक्षेपों का समर्थन करती है।
  • सामुदायिक भागीदारी (Community involvement): पारंपरिक ज्ञान और आजीविका (traditional knowledge and livelihoods) को मान्यता देते हुए सहभागी योजना (participatory planning) और समुदाय-आधारित जल संरक्षण (community‑based water conservation) के माध्यम से स्थानीय हितधारकों (Local stakeholders) को शामिल किया जाएगा।

यह क्यों मायने रखता है

  • एकीकृत बेसिन योजना (Integrated basin planning) पानी की उपलब्धता और मांगों का समग्र दृष्टिकोण (holistic view) प्रदान करके राज्यों और क्षेत्रों के बीच संघर्ष (conflicts) को कम कर सकती है।
  • उत्तर-पूर्वी नदियों के बेहतर प्रबंधन से जलविद्युत क्षमता (hydropower potential) को खोला जा सकता है, सिंचाई बढ़ाई जा सकती है और नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र (fragile ecosystems) का संरक्षण करते हुए नेविगेशन (navigation) में सुधार किया जा सकता है।
  • सर्वेक्षण और निगरानी के लिए आधुनिक तकनीक (modern technology) का उपयोग बाढ़ और सूखे के लिए अधिक सटीक डेटा (accurate data) और प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली (early warning systems) को सक्षम बनाता है।
  • सामुदायिक भागीदारी यह सुनिश्चित करती है कि विकास परियोजनाएं स्थानीय जरूरतों पर विचार करें और विस्थापन (displacement) को कम करें।

निष्कर्ष

नदी बेसिन प्रबंधन योजना (River Basin Management scheme) को जारी रखना एकीकृत जल-संसाधन योजना (integrated water‑resource planning) के प्रति दीर्घकालिक प्रतिबद्धता (long‑term commitment) का संकेत देता है। वैज्ञानिक उपकरणों (scientific tools) को सहभागी दृष्टिकोणों (participatory approaches) के साथ जोड़कर, यह कार्यक्रम भारत के कुछ सबसे अधिक पानी वाले लेकिन आर्थिक रूप से हाशिए वाले क्षेत्रों (economically marginalised regions) में सतत विकास (sustainable development) का मार्ग प्रशस्त कर सकता है।

स्रोत:

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