पर्यावरण

Tibetan Antelope: चिरू, शाहतूश शॉल और CITES परिशिष्ट I

Tibetan Antelope: चिरू, शाहतूश शॉल और CITES परिशिष्ट I

चर्चा में क्यों?

नई दिल्ली की एक अदालत ने तिब्बती मृग (Tibetan antelope) के बालों से बने शाहतूश शॉल (Shahtoosh shawls) के निर्यात का प्रयास करने के आरोप में जयपुर की एक आर्ट गैलरी के मालिक को दोषी ठहराया है। लगभग 17 वर्षों तक वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो (WCCB) और केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) द्वारा जांचे गए इस मामले में तीन साल की जेल और जुर्माना लगाया गया है। यह सजा लुप्तप्राय प्रजातियों के अवैध व्यापार से निपटने के लिए भारत की प्रतिबद्धता को रेखांकित करती है।

पृष्ठभूमि

तिब्बती मृग, जिसे स्थानीय रूप से चिरू (chiru) (पेंथोलॉप्स हॉजसोनी - Pantholops hodgsonii) कहा जाता है, एक मध्यम आकार का मृग (antelope) है जो ठंडे किंघई-तिब्बती पठार (Qinghai-Tibetan plateau) के अनुकूल है। इसके बाल घने ऊनी होते हैं और नर में लंबे पतले सींग होते हैं। ये जानवर 3,250 और 5,500 मीटर की ऊंचाई के बीच झुंड में रहते हैं, और घास और अल्पाइन झाड़ियों को खाते हैं। शिकारियों (Poachers) ने कभी इसके बढ़िया अंडरफर (underfur) के लिए हजारों मृगों को मार डाला था, जिसे शाहतूश में काता (spun) जा सकता है - एक नरम, गर्म शॉल जो एक विलासिता की वस्तु (luxury item) बन गई। प्रत्येक शॉल के लिए तीन से पांच जानवरों के बालों की आवश्यकता होती है, जिससे उनकी आबादी में भारी गिरावट आई है।

ऐतिहासिक मामला (The landmark case)

  • जब्ती और जांच: दिसंबर 2008 में, दिल्ली के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर सीमा शुल्क अधिकारियों (customs officials) ने 1,290 शॉल की एक खेप (consignment) पकड़ी जिसमें तिब्बती मृग के बाल होने का संदेह था। वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो (WCCB) ने सीबीआई में शिकायत दर्ज कराई, यह पहली बार था जब सीबीआई द्वारा वन्यजीव अपराध (wildlife offence) पर मुकदमा चलाया गया था।
  • साक्ष्य संग्रह (Evidence collection): भारतीय वन्यजीव संस्थान (Wildlife Institute of India) के फोरेंसिक परीक्षणों (Forensic tests) ने 41 शॉल में तिब्बती मृग फाइबर की पुष्टि की। इस मामले में कई वर्षों तक WCCB, CBI, सीमा शुल्क और वैज्ञानिकों के बीच समन्वय की आवश्यकता थी।
  • फैसला (Verdict): मार्च 2026 में, अदालत ने गैलरी मालिक को तीन साल जेल की सजा सुनाई और जुर्माना लगाया। फैसले में इस बात पर जोर दिया गया कि भारत के वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 (Wildlife (Protection) Act, 1972) और लुप्तप्राय प्रजातियों में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर कन्वेंशन (CITES) के तहत शाहतूश व्यापार प्रतिबंधित है।

तिब्बती मृग के बारे में

  • स्थिति: प्रजातियों को IUCN रेड लिस्ट में नियर थ्रेटेंड (Near Threatened) के रूप में सूचीबद्ध किया गया है, CITES परिशिष्ट I (CITES Appendix I) में रखा गया है और भारत के वन्यजीव अधिनियम की अनुसूची I (Schedule I) के तहत संरक्षित किया गया है। ये पदनाम शिकार और व्यापार पर रोक लगाते हैं।
  • जीव विज्ञान: नर मादाओं की तुलना में बड़े होते हैं और लंबे सींग और गहरे रंग के चेहरे के निशान होते हैं, जबकि मादाओं में सींग नहीं होते हैं। जानवर मौसमी रूप से प्रवास करते हैं, गर्मियों और सर्दियों के चरागाहों के बीच 400 किलोमीटर तक की यात्रा करते हैं।
  • संरक्षण के खतरे: हालांकि 1990 के दशक में लगभग 65,000 के निचले स्तर से उबरकर आज आबादी 150,000 से अधिक हो गई है, लेकिन चिरू अभी भी अवैध शिकार, आवास विखंडन (habitat fragmentation), पशुधन के साथ प्रतिस्पर्धा और जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशील (vulnerable) हैं।

महत्व

  • वन्यजीव संरक्षण: सफल अभियोजन (prosecution) दर्शाता है कि लंबी समयसीमा के बावजूद वन्यजीव अपराधों की जांच की जा सकती है और दंडित किया जा सकता है। यह भविष्य के अपराधियों को रोक सकता है।
  • उपभोक्ता जागरूकता: शाहतूश उत्पादन के पीछे की क्रूरता को उजागर करने से ऐसी लक्जरी वस्तुओं की मांग कम हो सकती है।
  • सतर्कता की आवश्यकता: लुप्तप्राय प्रजातियों की सुरक्षा के लिए सीमाओं की निरंतर निगरानी, ​​सख्त प्रवर्तन (stricter enforcement) और एजेंसियों के बीच सहयोग महत्वपूर्ण है।

निष्कर्ष

अदालत का फैसला अवैध वन्यजीव व्यापार के खिलाफ कड़ा संदेश देता है। तिब्बती मृग की रक्षा के लिए मौजूदा कानूनों को लागू करने, जन जागरूकता बढ़ाने और इसके उच्च-ऊंचाई वाले आवास में संरक्षण का समर्थन करने की आवश्यकता है।

स्रोत: Press Information Bureau; IFAW

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