चर्चा में क्यों?
प्रशांत महासागर (Pacific island) का द्वीपीय देश तुवालू (Tuvalu) जलवायु परिवर्तन के खिलाफ अपने अस्तित्व की लड़ाई को लगातार उजागर कर रहा है। बढ़ते समुद्र के स्तर (sea levels) से इसकी अधिकांश भूमि डूबने का खतरा है, जिससे सरकार मेटावर्स (metaverse) में देश का डिजिटल संस्करण (digital version) बनाने और अपने नागरिकों के लिए प्रवास के रास्ते (migration pathways) तलाशने पर मजबूर हो गई है। हालिया रिपोर्टों में कहा गया है कि पिछले 30 वर्षों में तुवालू के आसपास समुद्र का स्तर लगभग 21 सेंटीमीटर बढ़ गया है, जो वैश्विक औसत का लगभग दोगुना है, और अनुमान बताते हैं कि 2100 तक 95 प्रतिशत द्वीप पानी के भीतर हो सकते हैं।
पृष्ठभूमि
तुवालू में मध्य प्रशांत (central Pacific) में नौ निचले प्रवाल द्वीप (atolls) और द्वीप शामिल हैं, जिनका कुल भूमि क्षेत्रफल लगभग 26 वर्ग किलोमीटर है। इसका उच्चतम बिंदु (highest point) समुद्र तल से केवल 4.6 मीटर ऊपर है। देश की आबादी वर्षा जल (rainwater), आयातित वस्तुओं (imported goods) और निर्वाह कृषि (subsistence agriculture) पर बहुत अधिक निर्भर है। तुवालू का विशेष आर्थिक क्षेत्र (Exclusive Economic Zone) लगभग 900,000 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है, जिससे यह छोटा भूभाग होने के बावजूद मूल्यवान मत्स्य पालन (valuable fisheries) पर नियंत्रण प्राप्त करता है। हालाँकि, इसके एटोल (atolls) तूफानी लहरों (storm surges), खारे पानी की घुसपैठ (saltwater intrusion) और कटाव (erosion) के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हैं।
प्रमुख घटनाक्रम
- डिजिटल संरक्षण (Digital preservation): 2022 में सरकार ने यदि इसके द्वीप निर्जन (uninhabitable) हो जाते हैं तो तुवालू की संस्कृति और राज्य (statehood) को संरक्षित करने के लिए मेटावर्स में एक डिजिटल राष्ट्र (digital nation) बनाने की योजना की घोषणा की। इसमें सरकारी सेवाओं और सांस्कृतिक विरासत (cultural heritage) का डिजिटलीकरण (digitising) शामिल है।
- प्रवास समझौते (Migration agreements): तुवालू ने ऑस्ट्रेलिया के साथ फलेपिली यूनियन (Falepili Union) पर हस्ताक्षर किए, जिससे प्रति वर्ष 280 नागरिकों को वहां रहने और काम करने की अनुमति मिल गई। 2025 और 2026 के बीच 90 प्रतिशत से अधिक तुवालुवासियों ने इस कार्यक्रम के लिए आवेदन किया, जो जलवायु प्रवासन (climate migration) की तात्कालिकता को रेखांकित करता है।
- भूमि सुधार परियोजनाएं (Land reclamation projects): तुवालु तटीय अनुकूलन परियोजना (Tuvalu Coastal Adaptation Project) ऊंची भूमि बनाने के लिए रेत (sand) की खुदाई (dredging) कर रही है। पहले चरण में लगभग सात हेक्टेयर भूमि तैयार की गई, और दूसरे चरण में लगभग 55 मिलियन अमेरिकी डॉलर की लागत से और अधिक निर्माण करने का लक्ष्य है। इस नई भूमि को अनुमानित समुद्र-स्तर में वृद्धि (sea-level rises) से ऊपर उठाया गया है और इसमें घर तथा बुनियादी ढाँचे (infrastructure) होंगे।
तुवालू क्यों मायने रखता है
- जलवायु न्याय का प्रतीक (Symbol of climate justice): तुवालू की दुर्दशा (plight) छोटे द्वीप विकासशील राज्यों (small island developing states) पर जलवायु परिवर्तन के असंगत प्रभाव (disproportionate impact) को दर्शाती है। ये देश वैश्विक ग्रीनहाउस-गैस (greenhouse-gas) उत्सर्जन में बहुत कम योगदान देते हैं लेकिन इन्हें सबसे गंभीर परिणामों (severest consequences) का सामना करना पड़ता है।
- कानूनी मिसाल (Legal precedent): इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस (International Court of Justice) की 2025 की एक सलाहकार राय (advisory opinion) ने स्पष्ट किया कि समुद्र के स्तर में वृद्धि के कारण क्षेत्र का नुकसान अपने आप राज्य (statehood) को नकारता नहीं है। तुवालू के द्वीप निर्जन हो जाने पर भी यह समुद्री क्षेत्रों (maritime zones) और संसाधनों पर दावा करना जारी रख सकता है।
- गरिमा के साथ प्रवासन (Migration with dignity): प्रवास के मार्गों (migration pathways) पर बातचीत करके और डिजिटल शासन मॉडल (digital governance models) बनाकर, तुवालू यह सुनिश्चित करना चाहता है कि उसके नागरिक अपनी राष्ट्रीय पहचान बनाए रखें और विदेशों में शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल और रोजगार तक पहुंच प्राप्त करें।
स्रोत: UN News