खबरों में क्यों?
दो भारतीय संरक्षणवादियों (conservationists), डॉ बरखा सुब्बा और सुश्री परवीन शेख को हिमालयन सैलामैंडर (Himalayan salamander) और इंडियन स्किमर (Indian skimmer) की रक्षा करने में उनके जमीनी स्तर (grassroots) के काम के लिए अप्रैल 2026 में प्रतिष्ठित व्हिटली अवार्ड (Whitley Awards) प्राप्त हुए। अक्सर "ग्रीन ऑस्कर (Green Oscars)" कहे जाने वाले ये पुरस्कार ग्लोबल साउथ (Global South) के उन नेताओं को पहचानते हैं जो प्रभावी, समुदाय-आधारित संरक्षण का प्रदर्शन करते हैं।
व्हिटली अवार्ड्स के बारे में
व्हिटली फंड फॉर नेचर (Whitley Fund for Nature), एक यूके-आधारित (UK‑based) चैरिटी है, जो हर साल सात संरक्षण नेताओं को पुरस्कार देती है। विजेताओं को £50,000 का प्रोजेक्ट फंडिंग और उनकी पहल को बढ़ाने के लिए समर्थन मिलता है। चयन पैनल में शिक्षाविद और संरक्षण विशेषज्ञ शामिल होते हैं, और विजेताओं को नेतृत्व और धन उगाहने (fundraising) में प्रशिक्षण प्रदान किया जाता है।
बरखा सुब्बा - हिमालयन सैलामैंडर को बचाना
डॉ बरखा सुब्बा पूर्वी हिमालय के पहाड़ी शहर दार्जिलिंग (Darjeeling) में काम करती हैं। उनका प्रोजेक्ट हिमालयन सैलामैंडर (Tylototriton himalayanus) पर केंद्रित है, जो भारत, नेपाल और भूटान में पाई जाने वाली छिपकली जैसी उभयचर (amphibian) स्थानिक प्रजाति है। सैलामैंडर लगभग 17 सेंटीमीटर तक बढ़ता है, इसमें तराजू (scales) नहीं होते हैं और इसका जीवनकाल एक दशक से अधिक होता है। इस प्रजाति को IUCN रेड लिस्ट में असुरक्षित (Vulnerable) के रूप में सूचीबद्ध किया गया है।
सैलामैंडर के लिए खतरों में विकास के लिए आर्द्रभूमि (wetlands) की निकासी, अनियमित पर्यटन, कृषि भूमि का रूपांतरण और जलवायु परिवर्तन शामिल हैं। डॉ सुब्बा का प्रोजेक्ट दार्जिलिंग में सात प्रजनन तालाबों (breeding ponds) की रक्षा करता है:
- आर्द्रभूमि को बहाल करना और आक्रामक पौधों (invasive plants) को हटाना।
- पर्यावरण के अनुकूल भूमि उपयोग और प्रकृति-आधारित पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए स्थानीय समुदायों और चाय बागानों (tea estates) के साथ काम करना।
- काइटरिड फंगल संक्रमण (chytrid fungal infections) की निगरानी करना जो उभयचरों को तबाह कर सकता है।
- अंतरराष्ट्रीय (transboundary) दिशानिर्देश विकसित करना ताकि भारत, नेपाल और भूटान इस विकासवादी रूप से विशिष्ट प्रजाति की सुरक्षा का समन्वय कर सकें।
परवीन शेख - इंडियन स्किमर की रक्षा
इंडियन स्किमर (Rynchops albicollis) एक करिश्माई नदी पक्षी है, जिसका लंबा निचला जबड़ा (mandible) इसे मछली पकड़ने के लिए पानी की सतह को स्किम करने की अनुमति देता है। मुख्य रूप से भारत और बांग्लादेश में गंगा, यमुना और चंबल नदियों के किनारे 3,000 से कम स्किमर बचे हैं। इसे लुप्तप्राय (Endangered) के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (Bombay Natural History Society) के साथ काम करते हुए, सुश्री परवीन शेख ने "गार्जियंस ऑफ द स्किमर (Guardians of the Skimmer)" पहल की स्थापना की। चंबल नदी (Chambal River) पर इस कार्यक्रम ने घोंसले के अस्तित्व को 14% से बढ़ाकर 27% कर दिया और स्थानीय स्किमर आबादी को लगभग 1,000 पक्षियों (2017 में 400 से ऊपर) तक बढ़ाने में मदद की। व्हिटली फंडिंग के साथ वह इस मॉडल को प्रयागराज (Prayagraj) तक विस्तारित करने की योजना बना रही है, जहां गंगा और यमुना मिलती हैं। नियोजित कार्यों में शामिल हैं:
- अंडे और चूजों को शिकारियों और मानवीय गड़बड़ी से बचाने के लिए स्थानीय समुदायों से घोंसले के अभिभावकों (nest guardians) की भर्ती करना।
- शिकारी-प्रूफ बाड़ (predator‑proof fencing) स्थापित करना और घोंसले के स्थानों को ट्रैक करने के लिए जीपीएस मैपिंग (GPS mapping) का उपयोग करना।
- रेत के किनारों पर घोंसला बनाने से बचने और प्रजनन काल (breeding season) के दौरान शोर को कम करने के लिए नाव ऑपरेटरों और पर्यटकों को शिक्षित करना।
- नदी के आवासों (riverine habitats) को ख़राब करने वाले रेत खनन, मछली पकड़ने और अन्य गतिविधियों को विनियमित करने के लिए अधिकारियों के साथ काम करना।
महत्व
ये परियोजनाएँ दर्शाती हैं कि समुदाय-आधारित प्रबंधन (community‑based stewardship) विलुप्त होने की कगार (brink) पर मौजूद प्रजातियों को कैसे बचा सकता है। हिमालयन सैलामैंडर और इंडियन स्किमर दोनों स्वस्थ आर्द्रभूमि और नदियों के प्रमुख संकेतक हैं। उनकी सुरक्षा पूरे पारिस्थितिक तंत्र के संरक्षण में मदद करती है और पर्यावरण-पर्यटन (eco‑tourism) और पर्यावरण शिक्षा के माध्यम से स्थायी आजीविका (sustainable livelihoods) का समर्थन करती है।
स्रोत: Hindustan Times