चर्चा में क्यों?
ICAR-नेशनल ब्यूरो ऑफ फिश जेनेटिक रिसोर्सेज (National Bureau of Fish Genetic Resources), केरल यूनिवर्सिटी ऑफ फिशरीज़ एंड ओशन स्टडीज़ (Kerala University of Fisheries and Ocean Studies) और जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (Zoological Survey of India) के समुद्री वैज्ञानिकों ने आंध्र प्रदेश और ओडिशा के तटों पर मछली पकड़ने के बायकैच (by-catch) से एकत्र की गई स्नेक-ईल (snake-eel) की एक नई प्रजाति का वर्णन किया है। इस प्रजाति का नाम Bascanichthys chepakakiensis रखा गया है, जो तेलुगु शब्द "मछली" (chepa) और "काकीनाडा" (kaki) (वह बंदरगाह जिसके पास होलोटाइप पाया गया था) से लिया गया है。
पृष्ठभूमि
Bascanichthys जीनस (genus) स्नेक-ईल के Ophichthidae परिवार से संबंधित है। इस खोज से पहले, भारतीय जल में इस जीनस की केवल एक प्रजाति (Bascanichthys deraniyagalai) दर्ज की गई थी। 2024-25 में नियमित सर्वेक्षण के दौरान, शोधकर्ताओं ने काकीनाडा फिशिंग हार्बर (आंध्र प्रदेश) और अर्जापल्ली लैंडिंग सेंटर (ओडिशा) से दो नमूने एकत्र किए। विस्तृत रूपात्मक विश्लेषण (morphological analysis) से पता चला कि मछली किसी भी ज्ञात प्रजाति से मेल नहीं खाती। उनके निष्कर्ष मई 2026 में Ichthyological Exploration of Freshwaters पत्रिका में प्रकाशित हुए。
विशिष्ट विशेषताएँ
- शरीर का आकार और रंग: ईल का शरीर बहुत लंबा और पतला होता है, जिसकी पीठ हल्के भूरे रंग की होती है जो बीच के हिस्से में जैतून-भूरे (olive-grey) रंग और पेट की तरफ हल्के रंग में बदल जाती है। इसका थूथन (snout) गहरा भूरा है और इसके निकटतम रिश्तेदारों की तुलना में छोटा है।
- पृष्ठीय पंख (Dorsal fin) की स्थिति: पृष्ठीय पंख गिल (gill) के छिद्र के थोड़ा पीछे से शुरू होता है, जबकि Bascanichthys deraniyagalai में यह और पीछे से शुरू होता है। यह, पूंछ की लंबाई के साथ, नई प्रजाति को अलग पहचानने में मदद करता है।
- रीढ़ की हड्डी (Vertebrae) और दाँत: जीनस के अन्य सदस्यों की तुलना में इसमें गुदा पंख (anal fin) से पहले कम रीढ़ की हड्डियां होती हैं और दांतों की व्यवस्था (arrangement of teeth) विशिष्ट होती है।
- पेक्टोरल पंख (Pectoral fins): पेक्टोरल पंख बहुत छोटे और चप्पू के आकार (paddle-shaped) के होते हैं, जो इस प्रजाति की एक और विशिष्ट विशेषता है।
- व्युत्पत्ति (Etymology): यह नाम मछली के लिए तेलुगु शब्द और काकीनाडा के उपनाम को मिलाकर स्थानीय मछली पकड़ने वाले समुदाय (fishing community) को सम्मानित करता है। इस खोज से दुनिया भर में ज्ञात Bascanichthys प्रजातियों की संख्या 20 हो गई है।
निष्कर्ष
Bascanichthys chepakakiensis की खोज बंगाल की खाड़ी की समृद्ध लेकिन कम अध्ययन की गई समुद्री जैव विविधता (marine biodiversity) पर प्रकाश डालती है। संरक्षण योजना और टिकाऊ मत्स्य प्रबंधन (sustainable fisheries management) के लिए नई प्रजातियों का दस्तावेजीकरण आवश्यक है। निरंतर अन्वेषण से भारत के तटों पर छिपी हुई और अधिक विविधता का पता चल सकता है。