कला और संस्कृति

बुद्ध के अवशेष: पिपरहवा स्तूप, लद्दाख प्रदर्शनी

बुद्ध के अवशेष: पिपरहवा स्तूप, लद्दाख प्रदर्शनी

खबरों में क्यों?

उत्तर प्रदेश के पिपरहवा स्तूप (Piprahwa Stupa) से खोदे गए पवित्र अवशेषों को सार्वजनिक दर्शन के लिए लद्दाख ले जाया गया। इन अवशेषों को धार्मिक नेताओं और भारतीय वायु सेना (IAF) के कर्मियों द्वारा एस्कॉर्ट किया गया और अब इन्हें हेमिस मठ (Hemis Monastery) में प्रदर्शित किया जा रहा है।

पृष्ठभूमि

पिपरहवा स्तूप भारत-नेपाल सीमा के पास स्थित है और बुद्ध के गृहनगर प्राचीन कपिलवस्तु से जुड़ा है। 1898 में, ब्रिटिश इंजीनियर विलियम क्लैक्सटन पेप्पे (William Claxton Peppé) ने इस टीले की खुदाई की और एक सैंडस्टोन ताबूत पाया जिसमें बुद्ध के माने जाने वाले हड्डी के टुकड़े थे। इन हड्डियों को सोने के आभूषणों, कीमती पत्थरों और एक ब्राह्मी शिलालेख के साथ क्रिस्टल कास्केट (crystal caskets) में सील किया गया था, जो उन्हें शाक्य कबीले के अवशेषों के रूप में पहचानते हैं। 1970 के दशक में भारतीय पुरातत्वविदों द्वारा अतिरिक्त कास्केट और लघु स्तूप खोजे गए थे।

वर्तमान प्रदर्शनी

  • जुलूस और स्वागत: अवशेषों को IAF विमान द्वारा दिल्ली से लेह ले जाया गया। हेमिस मठ में उन्हें स्थापित करने से पहले एक औपचारिक जुलूस ने मंत्रोच्चार और प्रार्थनाओं के साथ उनका स्वागत किया।
  • सार्वजनिक दर्शन: श्रद्धालु मठ में एक निर्धारित अवधि के दौरान अवशेषों के दर्शन कर सकते हैं। प्रदर्शनी का उद्देश्य क्षेत्र में बौद्ध विरासत को बढ़ावा देना और सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत करना है।
  • प्रत्यावर्तन का इतिहास: औपनिवेशिक काल (colonial era) के दौरान पिपरहवा के कुछ अवशेष विदेश ले जाए गए थे। 2025 में, नीलामी में देखे जाने के बाद भारत सरकार ने कई टुकड़ों को वापस स्वदेश लाया। उनकी वापसी बौद्ध विरासत को संरक्षित करने की भारत की प्रतिबद्धता को उजागर करती है।

महत्व

  • धार्मिक महत्व: बौद्ध लोग बुद्ध के अवशेषों को पवित्र मानते हैं। उन्हें प्रदर्शित करने से भक्तों को आध्यात्मिक चिंतन का अवसर मिलता है और बौद्ध सर्किट पर लद्दाख की स्थिति मजबूत होती है।
  • सांस्कृतिक कूटनीति: भारतीय राज्यों और अन्य देशों के साथ अवशेषों को साझा करने से दुनिया भर के बौद्ध समुदायों के साथ संबंध मजबूत होते हैं।
  • ऐतिहासिक मूल्य: पिपरहवा की खोजें बुद्ध के जीवन और बौद्ध धर्म के प्रारंभिक प्रसार के भौतिक प्रमाण प्रदान करती हैं। वे प्राचीन भारत की उन्नत शिल्प कौशल (craftsmanship) को भी प्रदर्शित करती हैं।

स्रोत: The Statesman

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