समाचार में क्यों?
Early July 2026 में Supreme Court ने दोहराया कि छोटी पीठों को बड़ी पीठों के फैसलों का पालन करना चाहिए। हरियाणा से जुड़ी एक आपराधिक अपील के दौरान अदालत ने per incuriam के सिद्धांत की व्याख्या की। इसने स्पष्ट किया कि कानूनी गलती के कारण किसी पुराने फैसले को कब नजरअंदाज किया जा सकता है। संवैधानिक कानून का अध्ययन करने वाले सभी लोगों के लिए यह व्याख्या महत्वपूर्ण हो गई है।
पृष्ठभूमि
Per incuriam का सिद्धांत नज़ीर के नियम का अपवाद है। सामान्य तौर पर अदालतें stare decisis के सिद्धांत के तहत पुराने फैसलों का पालन करती हैं। हालांकि, यदि कोई फैसला किसी बाध्यकारी क़ानून या समान या बड़ी पीठ के फैसले पर विचार करने में विफल रहता है, तो उसे per incuriam कहा जाता है। यह अवधारणा इंग्लैंड में विकसित हुई और मामले के कानूनों के माध्यम से भारतीय कानून में आई। State of U.P. v. Synthetics and Chemicals Ltd. (1991) में Supreme Court ने माना कि per incuriam के रूप में दिया गया फैसला भविष्य की पीठों को बाध्य नहीं करता है। यह सिद्धांत यह सुनिश्चित करके न्यायिक अनुशासन बनाए रखने में मदद करता है कि गलतियाँ स्थायी नज़ीर न बनें。
समझाए गए प्रमुख बिंदु
- Ratio and obiter: केवल फैसले का ratio decidendi, यानी निर्णय के लिए आवश्यक कानूनी कारण, नज़ीर बन सकता है। Obiter dicta, या यूं ही की गई टिप्पणियां, बाध्यकारी नहीं होती हैं।
- Per incuriam कब लागू होता है: कोई निर्णय तब per incuriam होता है जब वह किसी प्रासंगिक वैधानिक प्रावधान या बड़ी या समान पीठ के फैसले की अनदेखी करता है। छोटी पीठें बड़ी पीठ के फैसलों को per incuriam घोषित नहीं कर सकती हैं।
- सीमित दायरा (Narrow scope): अदालतें इस सिद्धांत का प्रयोग बहुत कम करती हैं। यह पुराने फैसले से हटने की अनुमति केवल तब देता है जब वह फैसला स्पष्ट रूप से किसी चूक के कारण गलत हो।
- Stare decisis पर प्रभाव: किसी फैसले को per incuriam घोषित करने से उसकी बाध्यकारी शक्ति समाप्त हो जाती है, लेकिन यह अन्य सही फैसलों को प्रभावित नहीं करता है। भविष्य की पीठों को अभी भी वैध नज़ीर का पालन करना चाहिए।
निष्कर्ष
Per incuriam का सिद्धांत किसी गलत फैसले को बाध्यकारी कानून बने रहने से रोकता है। July 2026 में Supreme Court की व्याख्या यह रेखांकित करती है कि अदालतों को नज़ीर का सम्मान करना चाहिए, लेकिन गलतियों को सुधारना भी चाहिए। छात्रों को ratio और obiter के बीच का अंतर समझना चाहिए और यह जानना चाहिए कि कोई निर्णय अपनी बाध्यकारी शक्ति कब खो देता है।