इतिहास

Hul Diwas: 1855 का संथाल विद्रोह, Damin-i-Koh और इसका महत्व

Hul Diwas: 1855 का संथाल विद्रोह, Damin-i-Koh और इसका महत्व

समाचार में क्यों?

30 June 2026 को झारखंड और पड़ोसी राज्यों के आदिवासियों ने 1855 के संथाल विद्रोह की वर्षगांठ, हूल दिवस (Hul Diwas) मनाया। यह दिन संथाल लोगों के साहस का सम्मान करता है जिन्होंने दमनकारी जमींदारों और ब्रिटिश अधिकारियों के खिलाफ विद्रोह किया और न्याय की मांग की।

पृष्ठभूमि

संथाल लोग पूर्वी भारत में एक स्वदेशी समुदाय हैं। 1850 के दशक की शुरुआत में जंगलों को साफ करने और भूमि पर खेती करने के लिए हजारों संथाल परिवारों को दामिन-ए-कोह (अब संथाल परगना) में फिर से बसाया गया था। स्वायत्तता का वादा किए जाने के बावजूद, उन्हें इसके बजाय जमींदारों, साहूकारों और East India Company द्वारा भारी करों, जबरन श्रम और शोषण का सामना करना पड़ा। असंतोष तेजी से बढ़ा।

विद्रोह

  • विद्रोह की शुरुआत: 30 June 1855 को 10,000 से अधिक संथाल भोगनाडीह (झारखंड) में एकत्र हुए, ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता की घोषणा की और दमन से लड़ने की कसम खाई।
  • नेता: चार मुर्मू भाइयों—सिद्धू, कान्हू, चांद और भैरव—ने धनुष, तीर और कुल्हाड़ियों से लैस लगभग 60,000 सशस्त्र पुरुषों और महिलाओं का नेतृत्व किया।
  • विद्रोह का क्रम: लगभग छह महीनों तक संथाल लड़ाकों ने राजस्व कार्यालयों और ब्रिटिश अधिकार के प्रतीकों को निशाना बनाया। यह विद्रोह वर्तमान झारखंड और पश्चिम बंगाल में फैल गया, जिसके बाद वफादार जमींदारों की सहायता से ब्रिटिश सैनिकों ने जनवरी 1856 तक इसे कुचल दिया। 15,000 से अधिक संथाल मारे गए और लगभग 10,000 गांव नष्ट हो गए।
  • परिणाम: सिद्धू को अगस्त 1855 में और कान्हू को 1856 की शुरुआत में फांसी दे दी गई। विद्रोह के पैमाने ने औपनिवेशिक अधिकारियों को क्षेत्र को पुनर्गठित करने के लिए मजबूर किया। 1876 में Santhal Pargana Tenancy Act लागू किया गया, जो आदिवासी भूमि को गैर-आदिवासियों को हस्तांतरित करने से रोकता था।

महत्व

  • प्रारंभिक जन विद्रोह: हूल भारत में ब्रिटिश शासन के खिलाफ सबसे बड़े आदिवासी विद्रोहों में से एक था। यह 1857 के अधिक प्रसिद्ध सिपाही विद्रोह से पहले हुआ था।
  • भूमि अधिकार: विद्रोह ने भूमि पर आदिवासी संघर्षों को उजागर किया और संथाल भूमि जोत की रक्षा करने वाले विशेष किरायेदारी कानूनों को जन्म दिया।
  • सांस्कृतिक स्मृति: हूल दिवस का स्मरण स्वदेशी प्रतिरोध का जश्न मनाता है और आज सामाजिक न्याय और आदिवासी अधिकारों के आंदोलनों को प्रेरित करता है।

निष्कर्ष

हूल दिवस हमें उन संथालों की बहादुरी की याद दिलाता है जिन्होंने सीमित संसाधनों के साथ अन्याय का मुकाबला किया। उनके बलिदान ने औपनिवेशिक अधिकारियों को आदिवासी अधिकारों को मान्यता देने के लिए मजबूर किया और यह भूमि और सम्मान के लिए संघर्षों को प्रेरित करता रहता है। इस इतिहास को याद रखना समावेशी विकास और स्वदेशी समुदायों के प्रति सम्मान को प्रोत्साहित करता है।

स्रोत

NOA

Sign in Today’s news
Current affairs Daily news Shorts Economic Survey 2025-26 Subjects
Polity Economy Geography Environment History Science & Tech Intl. Relations Internal Security Art & Culture Social Issues
All subjects Exam info Syllabus 2026 Prelims syllabus Mains syllabus Exam pattern Eligibility & attempts OBC & EWS checker Resources Free downloads Booklist 2026 Previous year papers Video notes YouTube channel