चर्चा में क्यों?
ओडिशा (Odisha) के कोरापुट (Koraput) और कालाहांडी (Kalahandi) जिलों के आदिवासी समुदाय (Tribal communities) वन अधिकार अधिनियम (Forest Rights Act) के तहत केंदू (तेंदू) पत्तों (kendu leaves) पर अपने अधिकारों (rights) का दावा कर रहे हैं। हाल की सफलता की कहानियों (success stories) से पता चलता है कि ग्राम सभाओं (gram sabhas) ने इन पत्तों के संग्रह और बिक्री (collection and sale) का प्रबंधन किया है, जिसके परिणामस्वरूप पत्ते तोड़ने वालों (leaf pluckers) की आय (incomes) में वृद्धि हुई है और खरीद (procurement) अधिक पारदर्शी (transparent) हुई है। यह मुद्दा तब ध्यान में आया जब पत्ते तोड़ने वालों ने 2026 के सीज़न की शुरुआत समय पर भुगतान (timely payments) और अपने अधिकारों (rights) की मान्यता की मांग के साथ की।
पृष्ठभूमि
केंदू का पत्ता डायोस्पायरोस मेलानोक्सिलॉन (Diospyros melanoxylon) पेड़ से आता है और भारत में लोकप्रिय एक प्रकार के हाथ से लपेटे जाने वाले सिगरेट, बीड़ी (bidis) को लपेटने के लिए व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है। क्योंकि बीड़ी पारंपरिक सिगरेट (conventional cigarettes) से अधिक बिकती है, इस पत्ते को कभी-कभी कई राज्यों का "हरा सोना (green gold)" कहा जाता है। प्रमुख उत्पादकों (Major producers) में मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh), छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh), ओडिशा (Odisha), महाराष्ट्र (Maharashtra) और गुजरात (Gujarat) शामिल हैं। भारतीय कानून के तहत, केंदू पत्तों को "लघु वनोपज (minor forest produce)" के रूप में वर्गीकृत (classified) किया गया है और कुछ राज्यों में इसका राष्ट्रीयकरण (nationalised) किया गया है, जिसका अर्थ है कि सरकार खरीद और व्यापार (procurement and trade) को नियंत्रित करती है। वन अधिकार अधिनियम (2006) (Forest Rights Act - 2006) स्थानीय समुदायों को अपनी ग्राम सभाओं के माध्यम से ऐसी उपज पर प्रबंधन अधिकारों (management rights) का दावा करने की अनुमति देता है।
हाल के घटनाक्रम (Recent developments)
- समुदाय-प्रबंधित व्यापार (Community-managed trade): कालाहांडी जिले के कई गांवों में, ग्राम सभाओं के संघों (federations) ने केंदू पत्तों के संग्रह और बिक्री का जिम्मा ले लिया है। वे तुड़ाई (plucking) का आयोजन करते हैं, खरीद दरें (procurement rates) निर्धारित करते हैं, पत्ते तोड़ने वालों (pluckers) को पहचान पत्र (identity cards) जारी करते हैं और त्वरित भुगतान (prompt payment) सुनिश्चित करते हैं। 2023 और 2024 में संघों ने ₹15 करोड़ से अधिक का राजस्व (revenue) उत्पन्न किया और हजारों परिवारों को लाभान्वित किया।
- पत्ते तोड़ने वालों की आय (Income for pluckers): 2024 में 50 पत्तों के एक बंडल (bundle) की कीमत लगभग ₹7 थी। इसमें से लगभग ₹6 पत्ते तोड़ने वाले को दिए जाते थे और बाकी का उपयोग ग्राम सभा द्वारा प्रशासनिक लागतों (administrative costs) और सामुदायिक विकास (community development) के लिए किया जाता था। महिलाएं, जो पत्ते तोड़ने वालों में बहुसंख्यक (majority) हैं, उन्होंने एक या दो सप्ताह के काम में लगभग ₹5,000 कमाने की सूचना दी।
- कोरापुट में अधिकारों की मांग (Demand for rights in Koraput): कोरापुट में आदिवासी समूहों (Tribal groups) ने विरोध प्रदर्शन (protests) करते हुए मांग की है कि वन विभाग (forest department) ग्राम सभा के अधिकारों (rights) का सम्मान करे। वे भुगतान में देरी का आरोप लगाते हैं और जोर देते हैं कि बिचौलियों (middlemen) और ठेकेदारों (contractors) के बजाय समुदायों को मुनाफे में उनका हिस्सा मिलना चाहिए।
केंदू पत्ता क्यों महत्वपूर्ण है
- आजीविका (Livelihoods): केंदू पत्तों का संग्रह मध्य भारत में लाखों लोगों के लिए मौसमी रोजगार (seasonal employment) प्रदान करता है, विशेष रूप से आदिवासी और हाशिए के समुदायों (marginalised communities) की महिलाओं के लिए।
- गैर-लकड़ी वन उत्पाद (Non-wood forest product): लकड़ी (timber) के विपरीत, शाखाओं (branches) की छंटाई (pruning) करके केंदू के पत्तों को हर साल टिकाऊ रूप से (सस्टेनेबली) काटा जा सकता है। यह इसे समुदाय-आधारित (community-based) वन प्रबंधन (forest management) का एक महत्वपूर्ण घटक (component) बनाता है।
- पारदर्शिता की आवश्यकता (Need for transparency): कालाहांडी (Kalahandi) के अनुभवों से पता चलता है कि ग्राम सभाओं (gram sabhas) के सीधे नियंत्रण (direct control) से पारदर्शिता (transparency) बढ़ती है और यह सुनिश्चित होता है कि मुनाफा (profits) प्राथमिक संग्राहकों (primary collectors) तक पहुंचे।
स्रोत: DTE