कला और संस्कृति

पापुआ की कोरोवई जनजाति: ट्री-हाउस जीवन शैली और इतिहास

पापुआ की कोरोवई जनजाति: ट्री-हाउस जीवन शैली और इतिहास

खबरों में क्यों?

दक्षिण-पूर्वी पापुआ (southeastern Papua) के दूरदराज के जंगलों में रहने वाले एक छोटे स्वदेशी समुदाय (indigenous community), कोरोवई (Korowai) ने हाल ही में मीडिया के माध्यम से अपनी ट्री-हाउस जीवन शैली और अनूठी सांस्कृतिक प्रथाओं के लिए अंतर्राष्ट्रीय ध्यान आकर्षित किया। उनके जीवन के तरीके ने लोगों को आकर्षित किया है क्योंकि वे ऊंचे पेड़ों पर बने घरों में जमीन से बहुत ऊपर रहते हैं और बीसवीं सदी के अंत में ही उन्होंने बाहरी दुनिया से संपर्क किया था।

पृष्ठभूमि

कोरोवई (जिन्हें कोलुफापे (Kolufape) भी कहा जाता है) इंडोनेशियाई प्रांत पापुआ में अराफुरा सागर (Arafura Sea) से लगभग 150 किलोमीटर अंतर्देशीय घने तराई वर्षावनों (dense lowland rainforests) में निवास करते हैं। मानवविज्ञानियों (Anthropologists) का अनुमान है कि उनकी आबादी 2,500 से 4,000 लोगों के बीच है। 1970 के दशक के मध्य तक, उनका बाहरी लोगों से बहुत कम या कोई संपर्क नहीं था और वे शिकारी-संग्राहकों (hunter-gatherers) और छोटे पैमाने के बागवानों (horticulturalists) के रूप में जीवित रहे। उनकी भाषा और रीति-रिवाज पड़ोसी समूहों से अलग हैं।

अद्वितीय ट्री-हाउस जीवन

सदियों से कोरोवई लोग अपने परिवारों को बाढ़, मच्छरों, जंगली जानवरों और प्रतिद्वंद्वी जनजातियों के हमलों से बचाने के लिए छतरियों (canopy) के ऊंचे हिस्सों में अपने घर बनाते रहे हैं। अधिकांश घर ज़मीन से 8-12 मीटर ऊपर होते हैं, लेकिन कुछ 40-45 मीटर की आश्चर्यजनक ऊँचाई तक पहुँच जाते हैं। प्रत्येक घर स्थानीय सामग्रियों से एक साथ बंधा होता है: एक केंद्रीय बरगद का पेड़ (banyan tree) मुख्य सहायता प्रदान करता है, जबकि साबूदाना ताड़ (sago palms) फर्श, दीवारें और छप्पर प्रदान करते हैं। एक खांचेदार लॉग सीढ़ी या एक लचीले खंभे के माध्यम से पहुँचा जा सकता है। परिवार आमतौर पर एक नया बनाने से पहले लगभग तीन साल तक ट्री हाउस में रहते हैं।

संपर्क और परिवर्तन

मिशनरियों ने 1978 में कोरोवई का दौरा करना शुरू किया, और तब से समुदाय के कुछ सदस्य जमीन पर बने अधिक स्थायी गांवों में चले गए हैं। हालाँकि, कई लोग अभी भी औपचारिक कारणों से और अपनी स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए ट्री हाउस बनाए रखते हैं। ऐतिहासिक वृत्तांतों (accounts) से पता चलता है कि कोरोवई ने एक बार चुड़ैल माने जाने वाले पुरुषों (जिन्हें खखुआ (khakhua) कहा जाता है) के खिलाफ अनुष्ठान नरभक्षण (ritual cannibalism) का अभ्यास किया था, लेकिन ऐसी प्रथाएं फीकी पड़ गई हैं और आज शायद ही कभी रिपोर्ट की जाती हैं।

मुख्य बिंदु

  • स्थान: दक्षिणपूर्वी पापुआ, इंडोनेशिया; बेकिंग, ई (Ei) और ब्रेज़ा (Brazza) नदियों के बीच।
  • जनसंख्या: छोटे कुलों (clans) में रहने वाले लगभग 2,500–4,000 लोग।
  • जीवन शैली: शिकारी-संग्राहक और बागवान; आहार में मुख्य रूप से साबूदाना स्टार्च, केले, वन खेल और नदी की मछलियाँ शामिल हैं; सूअर और कुत्ते पाले जाते हैं।
  • वास्तुकला: 8-12 मीटर ऊंचे (कुछ 45 मीटर तक) बनाए गए ट्री हाउस; संरचना बरगद के तनों और साबूदाना ताड़ का उपयोग करती है; एक ही लकड़ी से उकेरी गई सीढ़ी।
  • सामाजिक परिवर्तन: 1970 के दशक के अंत में मिशनरियों के साथ संपर्क ने जमीनी गांवों और नए व्यापार नेटवर्क की स्थापना की, लेकिन कई कोरोवई सांस्कृतिक निरंतरता के लिए ट्री हाउस बनाना जारी रखते हैं।

स्रोत

News 18

Continue reading on the App

Save this article, highlight key points, and take quizzes.

App Store Google Play
Home Current Affairs 📰 Daily News 📊 Economic Survey 2025-26 Subjects 📚 All Subjects ⚖️ Indian Polity 💹 Economy 🌍 Geography 🌿 Environment 📜 History Exam Info 📋 Syllabus 2026 📝 Prelims Syllabus ✍️ Mains Syllabus ✅ Eligibility Resources 📖 Booklist 📊 Exam Pattern 📄 Previous Year Papers ▶️ YouTube Channel
Web App