पर्यावरण

Lower Lake Bhopal: NGT हस्तक्षेप, भोज वेटलैंड और अतिक्रमण

Lower Lake Bhopal: NGT हस्तक्षेप, भोज वेटलैंड और अतिक्रमण

चर्चा में क्यों?

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (National Green Tribunal - NGT) ने मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को भोपाल में लोअर लेक (Lower Lake) का निरीक्षण करने का निर्देश दिया है। यह आदेश झील के किनारे अवैध अतिक्रमण (encroachments), पानी में अनुपचारित सीवेज (untreated sewage) बहने और पानी की गुणवत्ता में सामान्य गिरावट के बारे में याचिकाओं के बाद आया। ट्रिब्यूनल की कार्रवाई इस ऐतिहासिक झील के सामने आने वाली चुनौतियों की ओर ध्यान आकर्षित करती है।

पृष्ठभूमि

लोअर लेक (जिसे स्थानीय रूप से छोटा तालाब - Chota Talab के रूप में भी जाना जाता है) को 1794 में नवाब हयात मुहम्मद खान बहादुर के दरबार के एक मंत्री छोटे खान (Chote Khan) द्वारा बनवाया गया था। बड़ी अपर लेक (Upper Lake) के साथ मिलकर, यह भोपाल के मध्य में भोज वेटलैंड (Bhoj Wetland) बनाता है। झील लगभग 1.29 वर्ग किलोमीटर को कवर करती है, जिसका जलग्रहण क्षेत्र (catchment area) 9.6 वर्ग किलोमीटर है। भोज वेटलैंड के एक हिस्से के रूप में, इसके पारिस्थितिक महत्व (ecological importance) और शहर के एक बड़े हिस्से में पीने के पानी की आपूर्ति के कारण इसे 2002 में रामसर स्थल (Ramsar site) नामित किया गया था। इस स्थिति के बावजूद, लोअर लेक में कोई ताजा पानी (fresh water inflow) नहीं आता है; यह अपर लेक से रिसाव (seepage) और बारिश पर निर्भर करता है। पिछले कुछ वर्षों में इसे इसके किनारे अतिक्रमण (encroachments), सीवेज और ठोस कचरे के निर्वहन (discharge), और गहराई तथा क्षेत्र में कमी से नुकसान उठाना पड़ा है।

एनजीटी द्वारा उजागर की गई मुख्य चिंताएं

  • अतिक्रमण और सिकुड़ता क्षेत्र: याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि जमीन बनाने के लिए झील के किनारों पर बोल्डर (boulders) और निर्माण मलबे (construction debris) रखे जा रहे हैं, जिससे सतह का क्षेत्रफल कम हो रहा है और आर्द्रभूमि (wetland) खंडित हो रही है।
  • सीवेज का प्रवाह: उचित सीवेज उपचार (sewage treatment) के बिना, आस-पास की बस्तियों से अपशिष्ट जल (wastewater) सीधे झील में बहता है। इससे सुपोषण (eutrophication), शैवाल प्रस्फुटन (algal blooms) और दुर्गंध (foul odours) पैदा होती है।
  • पानी की गुणवत्ता में गिरावट: परीक्षणों ने बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड (biochemical oxygen demand - BOD) और कोलीफॉर्म बैक्टीरिया (coliform bacteria) के उच्च स्तर को दिखाया है, जिससे पानी अधिकांश उपयोगों के लिए अनुपयुक्त (unfit) हो गया है और जलीय जीवन को खतरा है।
  • सांस्कृतिक और पारिस्थितिक मूल्य का नुकसान: झील भोपाल की विरासत का हिस्सा है और मछलियों, प्रवासी पक्षियों और अन्य वन्यजीवों का समर्थन करती है। गिरावट इस जैव विविधता को खतरे में डालती है और स्थानीय निवासियों के लिए मनोरंजक (recreational) और धार्मिक (religious) उपयोगों को कम करती है।

महत्व और आगे का रास्ता

  • शहरी आर्द्रभूमि (urban wetlands) की रक्षा करना: लोअर लेक इस बात का उदाहरण है कि कैसे अनियोजित शहरी विकास (unplanned urban growth) प्राकृतिक जल निकायों (natural water bodies) को नुकसान पहुंचा सकता है। इसे बहाल (Restoring) करने के लिए अतिक्रमण हटाने, बफर जोन (buffer zones) लागू करने और विस्थापित परिवारों के लिए वैकल्पिक आवास बनाने की आवश्यकता है।
  • सीवेज उपचार: नए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (sewage treatment plants) का उन्नयन या निर्माण करना और यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि केवल उपचारित प्रवाह (treated effluent) ही झील में प्रवेश करे। आसपास की कॉलोनियों में विकेन्द्रीकृत (Decentralised) सीवेज प्रबंधन भी प्रदूषण को कम कर सकता है।
  • सामुदायिक भागीदारी: संरक्षण (conservation) में स्थानीय समुदायों, मछली पकड़ने वाली सहकारी समितियों (fishing cooperatives) और विरासत समूहों (heritage groups) को शामिल किया जाना चाहिए। झील के महत्व के बारे में जन जागरूकता अभियान कूड़े (littering) और अवैध डंपिंग (illegal dumping) को रोकने में मदद कर सकते हैं।
  • दीर्घकालिक निगरानी (Long-term monitoring): पानी की गुणवत्ता की निरंतर निगरानी और पर्यावरण नियमों को सख्ती से लागू करने से भविष्य में गिरावट को रोकने में मदद मिलेगी। समय-समय पर गाद निकालने (desilting) और आक्रामक खरपतवारों (invasive weeds) को हटाने से पारिस्थितिक स्वास्थ्य (ecological health) में सुधार हो सकता है।

स्रोत: Times of India

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