खबरों में क्यों?
23 मई 2026 को ओडिशा और आंध्र प्रदेश की सीमा पर मचकुंड जलविद्युत परियोजना (Machkund hydroelectric project) के भूमिगत पावरहाउस (underground powerhouse) में आग लग गई। आग की वजह से श्रमिकों में दहशत फैल गई और आग बुझने तक टर्बाइनों को बंद करना पड़ा। किसी के हताहत होने की खबर नहीं है, लेकिन इस घटना ने भारत के सबसे पुराने अंतर-राज्यीय (inter‑state) बिजली स्टेशनों में से एक में पुराने उपकरणों के बारे में चिंताएं बढ़ा दी हैं।
पृष्ठभूमि
मचकुंड परियोजना एक 120 मेगावाट का जलविद्युत स्टेशन है जो मचकुंड (या सिलेरू - Sileru) नदी पर स्थित है, जो ओडिशा और आंध्र प्रदेश के बीच सीमा का हिस्सा है। नदी के बहाव का उपयोग करने का विचार 1920 के दशक के अंत में उत्पन्न हुआ जब जेपोर (Jeypore) के महाराजा विक्रम देव (Maharaja Vikram Dev) ने एक ब्रिटिश इंजीनियर द्वारा सर्वेक्षण (survey) शुरू किया। निर्माण द्वितीय विश्व युद्ध के बाद 1946 में शुरू हुआ और संयंत्र का औपचारिक उद्घाटन 1955 में राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने किया था। मूल रूप से मद्रास प्रेसीडेंसी (बाद में आंध्र प्रदेश) और उड़ीसा सरकार 70:30 के अनुपात में बिजली साझा करने के लिए सहमत हुए थे; बाद में दोनों तरफ मांग बढ़ने पर इसे 50:50 में बदल दिया गया। इस संयंत्र में छह उत्पादन इकाइयां (generating units) हैं, और इसकी उम्र के बावजूद आसपास के जिलों के लिए इसका उत्पादन महत्वपूर्ण बना हुआ है।
हालिया घटना
शुरुआती रिपोर्टों के अनुसार, तकनीकी खराबी (technical malfunction) के कारण पावरहाउस के अंदर आग लगी। दोपहर के आसपास श्रमिकों ने धुआं देखा और क्षेत्र खाली कर दिया, जबकि आपातकालीन टीमों ने टर्बाइनों को बंद कर दिया और आग पर काबू पाया। आग से केबल और नियंत्रण पैनल (control panels) क्षतिग्रस्त हो गए, जिससे आसपास के क्षेत्रों में बिजली गुल (power outages) हो गई। यह पता लगाने के लिए जांच चल रही है कि क्या पुराने उपकरण या रखरखाव में खामियां (maintenance lapses) दुर्घटना में योगदान करती हैं। दोनों राज्यों के अधिकारियों ने विद्युत प्रणालियों को उन्नत करने और ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए सुरक्षा प्रोटोकॉल की समीक्षा करने का वादा किया है।
प्रभाव और महत्व
- ऊर्जा आपूर्ति (Energy supply): मचकुंड दक्षिणी ओडिशा और उत्तरी आंध्र प्रदेश के कई जिलों में बिजली की आपूर्ति करता है। यहां तक कि थोड़े समय के लिए बंद होने से भी ग्रिड (grid) पर निर्भर घरों और उद्योगों में व्यवधान आता है।
- संयुक्त उद्यम (Joint venture): यह परियोजना ओडिशा और आंध्र प्रदेश की सरकारों के संयुक्त स्वामित्व में है। इसके संचालन के लिए घनिष्ठ समन्वय (close coordination) की आवश्यकता है, और आग ने आधुनिकीकरण में साझा निवेश की मांग को फिर से जगा दिया है।
- विरासत मूल्य (Heritage value): भारत की शुरुआती अंतर-राज्यीय पनबिजली (hydro) परियोजनाओं में से एक के रूप में, मचकुंड देश की इंजीनियरिंग विरासत का हिस्सा है। संरक्षणवादियों (Conservationists) का तर्क है कि इस विरासत को संरक्षित करने के लिए पुराने बुनियादी ढांचे को बदलने के बजाय उसमें सुधार (retrofitted) किया जाना चाहिए।
- सुरक्षा सबक (Safety lessons): यह घटना पुराने संयंत्रों में नियमित निरीक्षण (regular inspections), अद्यतन अग्निशमन उपकरण (fire‑fighting equipment) और श्रमिकों के लिए प्रशिक्षण की आवश्यकता को उजागर करती है जहां वायरिंग और नियंत्रण प्रणालियां पुरानी हो सकती हैं।
निष्कर्ष
मचकुंड की आग एक अनुस्मारक (reminder) के रूप में कार्य करती है कि भारत के ऊर्जा परिदृश्य में कई पुरानी पनबिजली परियोजनाएं शामिल हैं जो अभी भी लाखों घरों को रोशन करती हैं। बढ़ती मांग को पूरा करते हुए इन विरासत संयंत्रों को सुरक्षित रूप से चालू रखने के लिए आधुनिक नियंत्रणों, सुरक्षा ऑडिट (safety audits) और निवारक रखरखाव (preventive maintenance) में निवेश करना आवश्यक होगा।