समाचार में क्यों?
19 June 2026 को Royal College of Surgeons of Edinburgh के Playfair Auditorium में महर्षि Sushruta की एक कांस्य प्रतिमा का अनावरण किया गया। यह स्थापना प्राचीन भारतीय सर्जन के अग्रणी योगदान को मान्यता देती है और भारतीय और पश्चिमी चिकित्सा परंपराओं के बीच सेतु बनाती है।
पृष्ठभूमि
Sushruta लगभग 2 हज़ार 6 सौ साल पहले हुए थे और उन्हें अक्सर "सर्जरी का पिता" कहा जाता है। उन्होंने Sushruta Samhita लिखी, जो एक संस्कृत ग्रंथ है जिसमें 300 से अधिक शल्य चिकित्सा प्रक्रियाओं, 120 उपकरणों और 700 औषधीय पौधों का विवरण शामिल है। उनके काम ने स्वच्छता, शव विच्छेदन और सटीक ऑपरेटिव तकनीकों पर जोर दिया। उनके सबसे प्रसिद्ध योगदानों में से एक पुनर्रचनात्मक राइनोप्लास्टी के लिए माथे के फ्लैप की विधि थी, जिसका उपयोग आधुनिक प्लास्टिक सर्जरी में आज भी किया जाता है। 1505 में स्थापित, Royal College of Surgeons of Edinburgh दुनिया के सबसे पुराने शल्य चिकित्सा संस्थानों में से एक है।
स्थापना का विवरण
- प्रतिमा: इस मूर्तिकला का वजन लगभग 90 किलोग्राम है और इसे कांस्य में ढाला गया है। इसे भारत में तैयार किया गया था और स्कॉटलैंड भेजा गया था।
- दाता: Cheruvu Family Foundation ने कॉलेज को यह प्रतिमा उपहार में दी। फाउंडेशन ऐसी परियोजनाओं का समर्थन करता है जो भारतीय विरासत का उत्सव मनाती हैं।
- स्थान: यह प्रतिमा Playfair Auditorium में स्थित है, जो एक ऐतिहासिक हॉल है जहाँ सर्जनों ने सदियों से प्रशिक्षण प्राप्त किया है। Sushruta को यहाँ स्थापित करना प्राचीन भारतीय शल्य चिकित्सा ज्ञान और आधुनिक अभ्यास के बीच एक कड़ी का प्रतीक है।
- वैश्विक मान्यता: मेलबर्न और अन्य शहरों के मेडिकल स्कूलों में भी इसी तरह की प्रतिमाएँ स्थापित की गई हैं। ये प्रयास विज्ञान में भारत के प्रारंभिक योगदान के बारे में बढ़ती जागरूकता को दर्शाते हैं।
निष्कर्ष
विदेशों में Sushruta का सम्मान करना चिकित्सा ज्ञान की सार्वभौमिकता को उजागर करता है। यह छात्रों और सर्जनों को विविध परंपराओं से सीखने के लिए प्रोत्साहित करता है और भारतीयों को उनकी समृद्ध वैज्ञानिक विरासत की याद दिलाता है।