चर्चा में क्यों?
13 मार्च 2026 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य में बड़े पैमाने पर अवैध रेत खनन (illegal sand mining) और लुप्तप्राय प्रजातियों (endangered species) पर इसके प्रभाव का स्वतः संज्ञान (suo motu cognisance) लिया। जस्टिस विक्रम नाथ (Vikram Nath) और संदीप मेहता (Sandeep Mehta) की अगुवाई वाली पीठ ने चेतावनी दी कि एक संरक्षित क्षेत्र में वन्यजीव आवास के विनाश पर विभिन्न पर्यावरण कानूनों के तहत जुर्माना (penalties) लगेगा। इसने खनन जारी रखने की अनुमति देने के लिए राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के अधिकारियों को परोक्ष रूप से उत्तरदायी (vicariously liable) ठहराया।
पृष्ठभूमि
राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य, जिसे राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल वन्यजीव अभयारण्य (National Chambal Gharial Wildlife Sanctuary) के रूप में भी जाना जाता है, राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश द्वारा संयुक्त रूप से प्रबंधित 5,400 वर्ग किमी का नदी तटीय रिजर्व (riverine reserve) है। इसमें 960 किमी लंबी चंबल नदी का 425 किमी का हिस्सा शामिल है, जो विंध्य रेंज (Vindhya Range) से निकलती है और इटावा (Etawah) के पास यमुना (Yamuna) से मिलती है। क्षेत्र की विशिष्ट बंजर भूमि स्थलाकृति (badland topography) में कटाव (erosion) से बने गहरे खड्ड (deep ravines) शामिल हैं।
प्रोजेक्ट क्रोकोडाइल (Project Crocodile) के तहत 1979 में स्थापित अभयारण्य (sanctuary), गंभीर रूप से लुप्तप्राय घड़ियाल (gharial) (लंबे थूथन वाला मगरमच्छ) की रक्षा के लिए बनाया गया था, जिसकी आबादी अवैध शिकार (poaching), बांध निर्माण और रेत खनन के कारण गिर गई थी। यह शरणस्थली (refuge) रेड-क्राउन्ड रूफ कछुआ (red-crowned roof turtle), गंगा नदी डॉल्फ़िन (Ganges river dolphin) और 340 से अधिक प्रजातियों के निवासी और प्रवासी पक्षियों को भी आश्रय देती है। सैंडबैंक (Sandbanks) और द्वीप दुर्लभ इंडियन स्किमर (Indian skimmer) के लिए घोंसले के मैदान (nesting grounds) प्रदान करते हैं।
प्रमुख मुद्दे और अदालत की कार्रवाई
- अवैध रेत खनन: रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि भारी मशीनरी नदी के तल से रेत निकाल रही थी, घड़ियाल के घोंसले के स्थानों और कछुए के धूप सेंकने (basking) के स्थानों को नष्ट कर रही थी। राज्य सरकारों द्वारा कथित तौर पर अ-अधिसूचित (de-notified) कुछ क्षेत्रों को खनन के लिए खोल दिया गया था।
- स्वतः संज्ञान मामला: सुप्रीम कोर्ट ने समाचार रिपोर्ट पढ़ने के बाद "राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य में अवैध रेत खनन और लुप्तप्राय जलीय वन्यजीवों के लिए खतरा (In Re: Illegal sand mining in the National Chambal Sanctuary and threat to endangered aquatic wildlife)" शीर्षक से स्वतः संज्ञान रिट याचिका (writ petition) दर्ज की। इसने तीनों राज्यों और केंद्र सरकार को नोटिस (notices) जारी किया।
- अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराया गया: पीठ ने कहा कि वन, खनन, जल संसाधन और पुलिस विभागों के अधिकारियों को उनकी निष्क्रियता (inaction) के माध्यम से निवास स्थान के विनाश में सहायता और उकसाने के लिए जवाबदेह ठहराया जाएगा।
- कानूनी निहितार्थ (Legal implications): न्यायालय ने कहा कि एक संरक्षित क्षेत्र में आवास को नष्ट करने से वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, वन (संरक्षण) अधिनियम और जैविक विविधता अधिनियम के तहत अपराध आकर्षित होते हैं।
अभयारण्य का महत्व
- जैव विविधता हॉटस्पॉट (Biodiversity hotspot): प्रतिष्ठित घड़ियाल के अलावा, अभयारण्य में तेंदुए, लकड़बग्घे, सियार, भेड़िये, कछुए और जलपक्षियों (waterfowl) की प्रभावशाली विविधता है।
- अद्वितीय परिदृश्य (Unique landscape): चंबल के बीहड़ (Chambal ravines), जो कभी डकैतों के ठिकाने थे, वन्यजीवों को मानवीय अतिक्रमण (human encroachment) से बचाते हैं। यहां संरक्षण प्रयासों से संपूर्ण नदी पारिस्थितिकी तंत्र (river ecosystem) को लाभ होता है।
- संरक्षण चुनौतियाँ: अवैध खनन, प्रदूषण और प्रस्तावित बुनियादी ढांचा परियोजनाएं (proposed infrastructure projects) नाजुक निवास स्थान को खतरे में डालती हैं। न्यायालय का हस्तक्षेप सख्त प्रवर्तन (enforcement) की आवश्यकता पर प्रकाश डालता है।
स्रोत: The Hindu