राज्य व्यवस्था (Polity)

एनसीएलटी देरी: सुप्रीम कोर्ट, दिवाला संहिता

एनसीएलटी देरी: सुप्रीम कोर्ट, दिवाला संहिता

खबरों में क्यों?

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) में देरी का स्वत: संज्ञान (suo moto notice) लिया है। इसने इस बात पर प्रकाश डाला कि इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) के तहत सैकड़ों समाधान योजनाएं एक महीने से लेकर 700 से अधिक दिनों तक की अवधि के लिए लंबित (pending) थीं। कोर्ट ने चेतावनी दी कि इस तरह की देरी IBC द्वारा परिकल्पित (envisaged) त्वरित समाधान के उद्देश्य को हरा सकती है।

पृष्ठभूमि

NCLT एक अर्ध-न्यायिक (quasi-judicial) निकाय है जिसे कंपनी कानून और दिवालियापन (insolvency) से संबंधित मामलों पर फैसला करने के लिए 2016 में बनाया गया था। IBC के तहत कॉर्पोरेट दिवाला समाधान प्रक्रियाएं मुकदमेबाजी (litigation) सहित 330 दिनों के भीतर समाप्त होने वाली हैं। हालाँकि NCLT की कई बेंचों को न्यायाधीशों और बुनियादी ढांचे की कमी का सामना करना पड़ता है, जिससे बैकलॉग होता है। याचिकाकर्ताओं ने शिकायत की है कि अनसुलझे मामले पूंजी को फंसा कर रखते हैं और निवेश को हतोत्साहित (discourage) करते हैं।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियाँ

  • लंबित मामलों की संख्या: न्यायालय ने नोट किया कि 383 समाधान योजनाएं मंजूरी की प्रतीक्षा कर रही थीं। कुछ दो वर्षों से अधिक समय से लंबित थीं, जो वैधानिक समय-सीमा (statutory timelines) से काफी अधिक है।
  • IBC के लक्ष्यों पर प्रभाव: देरी समय-बद्ध दिवाला समाधान (time-bound insolvency resolution) के IBC के उद्देश्य को कमजोर करती है और संकटग्रस्त संपत्तियों (distressed assets) के मूल्य को कम कर सकती है। लंबे समय तक अनिश्चितता लेनदारों (creditors), कर्मचारियों और निवेशकों को प्रभावित करती है।
  • क्षमता वृद्धि की आवश्यकता: न्यायालय ने इस मुद्दे को एक उचित पीठ (bench) को निर्देशित किया और भारतीय दिवाला और दिवालियापन बोर्ड (IBBI) से लंबित मामलों पर डेटा प्रदान करने को कहा। इसने इस बात पर जोर दिया कि इस मामले को "युद्ध स्तर (war footing)" पर संबोधित किया जाना चाहिए।

महत्व

  • दिवाला ढांचे (insolvency framework) को मजबूत करना: बैड लोन को सुलझाने, व्यवहार्य व्यवसायों (viable businesses) को पुनर्जीवित करने और भारत में व्यापार करने में आसानी (ease of doing business) को बेहतर बनाने के लिए NCLT का कुशल कामकाज आवश्यक है।
  • निवेशकों का विश्वास: अनुमानित समयसीमा त्वरित रिकवरी सुनिश्चित करके और उचित ऋण संस्कृति को बढ़ावा देकर घरेलू और विदेशी निवेशकों को प्रोत्साहित करती है।
  • संस्थागत सुधार: सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से सरकार को NCLT में कर्मचारियों की संख्या बढ़ाने, अतिरिक्त बेंच बनाने और डिजिटल बुनियादी ढांचे में सुधार करने के लिए प्रेरित किया जा सकता है।

निष्कर्ष

NCLT भारत के कॉर्पोरेट और दिवाला ढांचे में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। देरी को संबोधित करने से न केवल इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड की भावना बरकरार रहेगी, बल्कि यह भी सुनिश्चित होगा कि संकटग्रस्त कंपनियों को समय पर समाधान मिले, जिससे लेनदारों और बड़े पैमाने पर अर्थव्यवस्था को लाभ होगा।

स्रोत: The New Indian Express

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