पर्यावरण

Paraquat Herbicide Ban: विषाक्तता की चिंताएं, स्वास्थ्य जोखिम और नियम

Paraquat Herbicide Ban: विषाक्तता की चिंताएं, स्वास्थ्य जोखिम और नियम

समाचार में क्यों?

खरपतवार नाशक (weed killer) पैराक्वाट डाइक्लोराइड (paraquat dichloride) ने तब ध्यान आकर्षित किया जब Syngenta ने जून 2026 के अंत तक इसका उत्पादन बंद करने की योजना की घोषणा की। कई देशों ने पहले ही इसकी अत्यधिक विषाक्तता (toxicity) के कारण इस शाकनाशी (herbicide) पर प्रतिबंध लगा दिया है, लेकिन भारत अभी भी कई फसलों पर इसके उपयोग की अनुमति देता है। राज्य सरकारों द्वारा हाल ही में लगाए गए प्रतिबंध बढ़ते स्वास्थ्य और पर्यावरणीय चिंताओं को उजागर करते हैं。

पृष्ठभूमि

पैराक्वाट को 1882 में संश्लेषित (synthesised) किया गया था। वैज्ञानिकों ने 1955 में इसके शाकनाशी गुण की खोज की, और इसका व्यावसायिक उपयोग 1961 में शुरू हुआ। यह रसायन ऑक्सीडेटिव तनाव (oxidative stress) के माध्यम से पौधे के ऊतकों (tissues) को नष्ट करके कार्य करता है। मनुष्यों में इसकी कुछ बूंदें भी घातक हो सकती हैं, और इसका कोई मारक (antidote) नहीं है। ऑस्ट्रिया ने 1993 में, स्विट्जरलैंड ने 1989 में और यूनाइटेड किंगडम ने 2007 में पैराक्वाट पर प्रतिबंध लगा दिया था। चीन, जो सबसे बड़े उपयोगकर्ताओं में से एक है, ने इसे 2017 में प्रतिबंधित कर दिया। Syngenta इसका प्रमुख उत्पादक है, लेकिन जल्द ही निर्माण बंद करने की योजना बना रहा है। अन्य कंपनियाँ इस उत्पाद की आपूर्ति करना जारी रखे हुए हैं。

भारत में उपयोग और मुद्दे

  • अनुमत फसलें: भारत के Central Insecticide Board and Registration Committee ने चाय, आलू, कपास, रबर, कॉफी, धान, गेहूं, मक्का और अंगूर सहित नौ फसलों के लिए पैराक्वाट को मंजूरी दी है। किसान मूंग की फसलों को जल्दी सुखाने के लिए अवैध रूप से भी इसका इस्तेमाल करते हैं।
  • स्वास्थ्य के लिए खतरे: पैराक्वाट निगलने पर फेफड़े और गुर्दे (kidney) की विफलता का कारण बनता है। जहर के मामले अक्सर दुर्घटनावश निगलने या आत्महत्याओं के परिणामस्वरूप होते हैं। इसका कोई विशिष्ट मारक नहीं है, और उपचार सहायक देखभाल पर केंद्रित होता है।
  • राज्य की कार्रवाइयां: तेलंगाना ने मार्च 2026 में दिशा-निर्देश पेश किए, जिसके तहत खरीदारों को कृषि अधिकारियों से प्रिस्क्रिप्शन प्राप्त करने और डीलरों को विवरण दर्ज करने की आवश्यकता होती है। जहर से होने वाली मौतों में वृद्धि के बाद आंध्र प्रदेश ने मई 2026 में पैराक्वाट की बिक्री और उपयोग पर 60 दिनों का प्रतिबंध लगा दिया था।
  • नियामक बहस (Regulatory debate): 2015 में भारत की अनुपम वर्मा समिति (Anupam Verma committee) ने सुरक्षा शर्तों के साथ निरंतर उपयोग की सिफारिश की थी। आलोचकों का तर्क है कि प्रवर्तन (enforcement) कमजोर है। 74 से अधिक देशों द्वारा पैराक्वाट पर प्रतिबंध लगाने के साथ ही, कार्यकर्ता भारत से इस शाकनाशी को चरणबद्ध तरीके से हटाने और सुरक्षित विकल्पों को बढ़ावा देने का आग्रह कर रहे हैं।

निष्कर्ष

पैराक्वाट की उच्च विषाक्तता (toxicity) और मारक (antidote) की कमी इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य की एक गंभीर चिंता बनाती है। राज्य सरकारों द्वारा बढ़ते प्रतिबंध सुरक्षित खरपतवार प्रबंधन की ओर एक बदलाव का संकेत देते हैं। नीति निर्माताओं (Policy makers) को विकल्पों का मूल्यांकन करना चाहिए और खेत मजदूरों तथा उपभोक्ताओं की सुरक्षा के लिए एक राष्ट्रीय प्रतिबंध पर विचार करना चाहिए, साथ ही प्रशिक्षण और प्रतिस्थापन कार्यक्रमों (substitution programmes) के माध्यम से किसानों का समर्थन करना चाहिए。

स्रोत

The Hindu

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