चर्चा में क्यों?
गंभीर रूप से लुप्तप्राय रेड-क्राउन्ड रूफ्ड टर्टल (red‑crowned roofed turtle) (Batagur kachuga) खबरों में रहा है क्योंकि संरक्षणवादियों ने इसकी घटती आबादी की चेतावनी दी है। पर्यावरण समूहों ने उत्तरी भारत में नदी के आवासों के मजबूत संरक्षण का आह्वान करने और प्रजातियों की दुर्दशा को उजागर करने के लिए मार्च 2026 के अंत में विश्व कछुआ दिवस (World Turtle Day) का उपयोग किया।
पृष्ठभूमि (Background)
नदी में रहने वाला यह कछुआ Batagur जीनस की तीन प्रजातियों में से एक है। प्रजनन के मौसम के दौरान नर कछुओं को उनके ज्वलंत लाल सिर और चमकीले पीले गले द्वारा तुरंत पहचाना जा सकता है; मादाएं बहुत बड़ी होती हैं लेकिन फीकी होती हैं। ऐतिहासिक रूप से, रेड-क्राउन्ड रूफ्ड टर्टल असम से लेकर पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश तक पूरी गंगा बेसिन में निवास करते थे। मांस और अंडों के लिए शिकार, रेत खनन, बांध निर्माण, मछली पकड़ने के जाल में फंसने और प्रदूषित जलमार्गों के कारण पिछली शताब्दी में उनकी संख्या में लगभग 80 प्रतिशत की गिरावट आई है।
वर्तमान स्थिति और खतरे (Current status and threats)
- आबादी (Population): दुनिया भर में 1,000 से कम वयस्क बचे हैं। अंतिम व्यवहार्य जंगली आबादी चंबल नदी के एक छोटे से हिस्से में बची है, जिसमें शायद 500 प्रजनन करने वाली मादाएं हैं।
- कानूनी संरक्षण (Legal protection): इस प्रजाति को IUCN रेड लिस्ट में गंभीर रूप से लुप्तप्राय (Critically Endangered) के रूप में सूचीबद्ध किया गया है, भारत के वन्यजीव संरक्षण अधिनियम (Wildlife Protection Act) की अनुसूची I में रखा गया है और CITES के परिशिष्ट II के तहत शामिल किया गया है।
- पारिस्थितिक भूमिका (Ecological role): ये कछुए सर्वाहारी (omnivores) हैं जो जलीय वनस्पति और अकशेरुकी (invertebrate) आबादी को नियंत्रित करने में मदद करते हैं। लंबे समय तक जीवित रहने वाले सरीसृपों के रूप में, वे नदी के स्वास्थ्य के जैव-संकेतक (bio-indicators) हैं।
- मुख्य खतरे (Main threats): मांस और पारंपरिक चिकित्सा के लिए अवैध शिकार, अंडे इकट्ठा करना, रेत और बजरी खनन, बांधों से अचानक पानी छोड़ना, किनारे का कटाव, प्रदूषण और जंगली कुत्तों जैसे शिकारी घोंसलों और बच्चों (hatchlings) को नष्ट कर देते हैं।
संरक्षण के प्रयास (Conservation efforts)
भारतीय कछुआ संरक्षण कार्यक्रम (Indian Turtle Conservation Programme) और नमामि गंगे (Namami Gange) पहल के तहत संरक्षणवादी बाड़ लगाकर, अंडों को हैचरी में स्थानांतरित करके और बच्चों को नदी में छोड़कर चंबल पर घोंसले के स्थानों की रक्षा करते हैं। सामुदायिक आउटरीच मछुआरों को उन जालों से बचने के लिए प्रोत्साहित करता है जिनमें कछुए फंसते हैं और उनके देखे जाने की रिपोर्ट करते हैं। चंबल के साथ निरंतर आवास संरक्षण और गंगा व यमुना में जल प्रवाह की बहाली इस प्रजाति की रिकवरी के लिए महत्वपूर्ण हैं।