कला एवं संस्कृति

Rupa Tarakasi: कटक सिल्वर फिलाग्री क्राफ्ट और जीआई टैग

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चर्चा में क्यों?

मार्च 2024 में कटक के सदियों पुराने सिल्वर फिलाग्री क्राफ्ट (silver filigree craft), जिसे रूपा तारकशी (Rupa Tarakasi) या चांदी तारकशी (Chandi Tarakasi) के नाम से जाना जाता है, को भौगोलिक संकेत (Geographical Indication - GI) टैग प्राप्त हुआ। 21 मई 2026 को "सिल्वर सिटी" ("Silver City") के कारीगरों ने एक सांस्कृतिक कार्यक्रम में अपने काम का प्रदर्शन किया, जिससे शिल्प की विरासत और आर्थिक क्षमता में नए सिरे से रुचि पैदा हुई।

पृष्ठभूमि

रूपा तारकशी का शाब्दिक अर्थ "चांदी की फिलाग्री" ("silver filigree") है। इस जटिल कला रूप (intricate art form) में बहुत पतले चांदी के तारों को मोड़कर लेस-जैसे पैटर्न (lace-like patterns) बनाए जाते हैं जिससे आभूषण, आभूषण और सजावटी टुकड़े (decorative pieces) बनाए जाते हैं। इतिहासकार इसकी उत्पत्ति का पता ओडिशा में भोई राजवंश (Bhoi dynasty) के शासन के दौरान सोलहवीं शताब्दी के मध्य (mid-sixteenth century) से लगाते हैं। मुगल संरक्षण (Mughal patronage) में इस शिल्प का विकास हुआ जब फारसी कारीगरों ने परिष्कृत फिलाग्री तकनीकों (refined filigree techniques) की शुरुआत की। समय के साथ स्थानीय कारीगरों ने इन विधियों को मंदिर की वास्तुकला (temple architecture), मिथकों (myths) और प्रकृति से लिए गए रूपांकनों (motifs) के साथ जोड़ दिया, जिससे यह कला विशिष्ट रूप से ओडिया बन गई। महानदी (Mahanadi River) पर एक हलचल भरा व्यावसायिक केंद्र, कटक, इस शिल्प का केंद्र (epicentre) बन गया।

शिल्प कौशल (Craftsmanship)

  • प्रक्रिया (Process): शुद्ध चांदी को पिघलाया जाता है और मानव बाल से भी पतले तारों में खींचा जाता है। कारीगर इन तारों को जटिल आकृतियों—फूल, बेलें, ज्यामितीय पैटर्न (geometric patterns)—में मोड़ते और लपेटते हैं और उन्हें एक चांदी के आधार पर सोल्डर (solder) करते हैं। एक टुकड़े को पूरा करने में दो से तीन सप्ताह लग सकते हैं।
  • उत्पाद (Products): उत्पादों में नाजुक झुमके (delicate earrings) और हार से लेकर बड़ी मूर्तियाँ और मंदिर के पहियों की प्रतिकृतियाँ (replicas) शामिल हैं। दुर्गा पूजा (Durga Puja) और बाली यात्रा (Bali Yatra) जैसे त्योहारों के दौरान, बड़े पैमाने पर फिलाग्री पृष्ठभूमि पंडालों और जुलूसों को सजाती है।
  • उपकरण और कौशल (Tools and skill): सरल उपकरणों—छोटे हथौड़े, चिमटी और ब्लोपाइप्स (blowpipes)—के बावजूद शिल्प सटीकता (precision) और धैर्य की मांग करता है। एक छोटी सी गलती दिनों के प्रयास को बर्बाद कर सकती है।

मान्यता और चुनौतियाँ (Recognition and challenges)

  • जीआई टैग (GI tag): मार्च 2024 में भौगोलिक संकेत रजिस्ट्री (Geographical Indications Registry) ने कटक सिल्वर फिलाग्री को एक जीआई टैग प्रदान किया, जो इसकी सांस्कृतिक विशिष्टता (cultural distinctiveness) को मान्यता देता है। यह टैग शिल्प को सस्ते अनुकरण (cheap imitations) से बचाने में मदद करता है और बाजार मूल्य (market value) को बढ़ाता है।
  • आर्थिक महत्व (Economic importance): कटक में सैकड़ों कारीगर परिवार अपनी आजीविका के लिए फिलाग्री के काम पर निर्भर हैं। जीआई टैग और नए सिरे से रुचि पर्यटकों और खरीदारों को आकर्षित कर सकती है, लेकिन इस क्षेत्र को अभी भी मशीन से बने आभूषणों (machine-made jewellery) और चांदी की बढ़ती कीमतों से प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है।
  • संरक्षण के प्रयास (Preservation efforts): सरकारी और गैर-सरकारी संगठन युवा कारीगरों को प्रशिक्षण और सहायता प्रदान करते हैं। आयोजन और प्रदर्शनियां (Events and exhibitions) शिल्प की विरासत को उजागर करती हैं और पारंपरिक तरीकों से समझौता किए बिना नवाचार (innovation) को प्रोत्साहित करती हैं।

निष्कर्ष

रूपा तारकशी ओडिशा की कलात्मकता और सांस्कृतिक लचीलेपन (cultural resilience) का एक वसीयतनामा (testament) है। जीआई टैग और हाल के प्रदर्शनों ने इस शिल्प को अतिदेय मान्यता (overdue recognition) दिलाई है। यह सुनिश्चित करने के लिए निरंतर संरक्षण (Sustained patronage), उचित मूल्य और कौशल विकास आवश्यक है कि कटक के फिलाग्री कारीगर आने वाली पीढ़ियों के लिए चांदी में कहानियां बुनते रहें।

स्रोत

IE

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