चर्चा में क्यों?
4 जून 2026 को वन्यजीव फोटोग्राफरों ने ओडिशा के सिमलीपाल टाइगर रिजर्व (Similipal Tiger Reserve) में अपने शावकों (cubs) के साथ एक मेलानिस्टिक बाघिन (melanistic tigress) की तस्वीरें जारी कीं। ये स्यूडो-मेलानिस्टिक (pseudo-melanistic) "काले" बाघ अत्यंत दुर्लभ हैं, और तस्वीरें इस अद्वितीय आनुवंशिक संस्करण (genetic variant) के सफल प्रजनन की पुष्टि करती हैं।
पृष्ठभूमि
सिमलीपाल टाइगर रिजर्व उत्तरी ओडिशा (Odisha) के मयूरभंज (Mayurbhanj) जिले में स्थित है और लगभग 2,750 वर्ग किलोमीटर में फैला है। इस अभयारण्य का नाम सिमुल (simul) (रेशम कपास - silk cotton) पेड़ के नाम पर रखा गया है और इसमें घास के मैदानों, नदियों और जोरांडा (Joranda) और बरेहीपानी (Barehipani) जैसे झरनों के बीच साल के जंगल का वर्चस्व है। यहाँ पौधों की 1,000 से अधिक प्रजातियाँ उगती हैं, जिनमें ऑर्किड (orchids) की लगभग 100 किस्में शामिल हैं। यह बंगाल के बाघों (Bengal tigers), तेंदुओं (leopards), एशियाई हाथियों (Asian elephants), सांभर, भौंकने वाले हिरण (barking deer), विशाल गिलहरी (giant squirrels) और पक्षियों की 264 प्रजातियों को आश्रय देता है। अभयारण्य के आसपास हो (Ho), संथाल (Santhal), भुमिजा (Bhumija) और खरिया (Kharia) सहित कई आदिवासी समुदाय (tribal communities) रहते हैं。
ऐतिहासिक रूप से स्थानीय शासकों के लिए शिकारगाह (hunting ground) रहे इस क्षेत्र को 1979 में वन्यजीव अभयारण्य (wildlife sanctuary), 1980 में राष्ट्रीय उद्यान (national park) (1986 में विस्तार) और 1994 में बायोस्फीयर रिजर्व (biosphere reserve) घोषित किया गया था। यूनेस्को (UNESCO) ने 2009 में इसे वर्ल्ड नेटवर्क ऑफ बायोस्फीयर रिजर्व (World Network of Biosphere Reserves) के हिस्से के रूप में मान्यता दी। रिजर्व की दूरदर्शिता (remoteness) ने इसके जंगलों और वन्यजीवों को संरक्षित करने में मदद की है।
कुछ बाघ काले क्यों होते हैं?
सिमलीपाल के "काले" बाघ एक अलग प्रजाति नहीं हैं, बल्कि बंगाल के बाघ हैं जिनमें टैक्पेप (Taqpep) जीन में एक अप्रभावी उत्परिवर्तन (recessive mutation) होता है। उत्परिवर्तन के कारण जानवरों की नारंगी और काली धारियां (stripes) चौड़ी होकर मिल जाती हैं, जिससे पूरी तरह से काले कोट का आभास होता है। नेशनल सेंटर फॉर बायोलॉजिकल साइंसेज (National Centre for Biological Sciences) के शोधकर्ताओं ने पाया कि यह दुर्लभ एलील (rare allele) संभवतः एक ही संस्थापक से उत्पन्न हुआ था और अलग-थलग (isolated) बाघों की आबादी के भीतर सीमित जीन प्रवाह (gene flow) और इनब्रीडिंग (inbreeding) के कारण सिमलीपाल में आम हो गया। स्यूडो-मेलानिज्म (Pseudo-melanism) सिमलीपाल के घने, छायादार जंगलों में छलावरण (camouflage) का लाभ प्रदान कर सकता है।
खोज का महत्व
- आनुवंशिक विविधता (Genetic diversity): काले बाघों का अस्तित्व जंगली बाघों की आबादी के भीतर आनुवंशिक भिन्नता (genetic variation) के संरक्षण के महत्व को रेखांकित करता है। अलग-थलग पड़े रिज़र्व और गलियारों (corridors) की सुरक्षा से अद्वितीय लक्षणों (unique traits) को बनाए रखने में मदद मिलती है।
- जनसंख्या स्वास्थ्य का सूचक (Indicator of population health): शावकों की उपस्थिति से पता चलता है कि सिमलीपाल में बाघों की आबादी सफलतापूर्वक प्रजनन कर रही है, हालांकि छोटे जनसंख्या आकार और इनब्रीडिंग (inbreeding) चिंता का विषय बने हुए हैं।
- पर्यटन और जागरूकता (Tourism and awareness): काले बाघों की तस्वीरें वैश्विक रुचि पैदा करती हैं और इकोटूरिज्म (ecotourism) को बढ़ावा दे सकती हैं। वे कम-ज्ञात रिज़र्व में आवास संरक्षण और अवैध शिकार विरोधी प्रयासों (anti-poaching efforts) की आवश्यकता पर भी ध्यान आकर्षित करते हैं।
निष्कर्ष
सिमलीपाल के स्यूडो-मेलानिस्टिक बाघ प्रकृति की आनुवंशिक रचनात्मकता (genetic creativity) का एक आकर्षक उदाहरण हैं। अभयारण्य के जंगलों को संरक्षित करना, बाघों के अन्य आवासों के साथ संपर्क (connectivity) बहाल करना और स्थानीय समुदायों का समर्थन करना यह सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण होगा कि ये दुर्लभ बिल्लियाँ आने वाली पीढ़ियों के लिए जीवित रहें।