International Relations

South Sudan Conflict: अकोबो क्षेत्र, SPLA-IO और जोंगलेई राज्य

South Sudan Conflict: अकोबो क्षेत्र, SPLA-IO और जोंगलेई राज्य

चर्चा में क्यों?

मार्च 2026 में दक्षिण सूडान (South Sudan) के उत्तर-पूर्वी शहर अकोबो (Akobo) पर नियंत्रण के लिए सरकारी बलों और विपक्षी गुटों के बीच लड़ाई छिड़ गई। विपक्षी बलों ने थोड़े समय के लिए शहर पर फिर से कब्जा कर लिया, जिससे संयुक्त राष्ट्र (United Nations) के अधिकारियों और सहायता एजेंसियों को हजारों नागरिकों को निकालने (evacuate) के लिए प्रेरित होना पड़ा। इस संघर्ष ने नियोजित चुनावों से पहले नए सिरे से अस्थिरता (instability) का संकेत दिया।

पृष्ठभूमि

दक्षिण सूडान 2011 में स्वतंत्र हुआ लेकिन जल्द ही जातीय और राजनीतिक आधार पर गृह युद्ध (civil war) में डूब गया। 2018 में हस्ताक्षरित एक शांति समझौते ने सत्ता-साझाकरण सरकार (power-sharing government) बनाई, फिर भी प्रमुख प्रावधान (provisions) लागू नहीं हुए हैं। जोंगलेई राज्य (Jonglei State) में अकोबो काउंटी पर लंबे समय से सरकारी सैनिकों और सूडान पीपुल्स लिबरेशन आर्मी-इन ऑपोजिशन (SPLA-IO) के बीच विवाद रहा है। यह क्षेत्र हजारों आंतरिक रूप से विस्थापित लोगों (internally displaced people) की मेजबानी करता है जो मानवीय सहायता पर निर्भर हैं।

हाल के घटनाक्रम

  • मार्च 2026 में संघर्ष: सरकारी सैनिकों के पीछे हटने के बाद विपक्षी लड़ाकों ने अकोबो पर कब्जा कर लिया। दक्षिण सूडान में संयुक्त राष्ट्र मिशन (UNMISS) ने चिंता व्यक्त की कि हिंसा पड़ोसी काउंटियों में फैल सकती है।
  • मानवीय प्रभाव (Humanitarian impact): डॉक्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (Médecins Sans Frontières) ने बताया कि उसने 17,000 विस्थापित लोगों को निकाला और लूटपाट (looting) के बाद एक फील्ड अस्पताल बंद कर दिया। सहायता संगठनों ने भोजन की कमी और बीमारियों के फैलने की चेतावनी दी क्योंकि लोग सुरक्षा के बिना भाग गए थे।
  • शांति प्रक्रिया को खतरा: 2018 का शांति समझौता नाजुक है। सुरक्षा व्यवस्था (security arrangements) पर असहमति और चुनावों में देरी ने स्थानीय सत्ता संघर्ष को बढ़ावा दिया है। अकोबो की घटना समझौते को पूरी तरह से लागू करने और शिकायतों को दूर करने की तात्कालिकता (urgency) को रेखांकित करती है।

संभावना

अकोबो में शांति बहाल करने के लिए प्रतिद्वंद्वी गुटों के बीच वास्तविक बातचीत (dialogue) और मानवीय पहुंच (humanitarian access) के आश्वासन की आवश्यकता होगी। स्थायी शांति निरस्त्रीकरण (disarmament), सशस्त्र समूहों को एक एकीकृत सेना में शामिल करने और विश्वसनीय चुनाव (credible elections) कराने पर निर्भर करती है। अंतर्राष्ट्रीय भागीदारों को मध्यस्थता (mediation) का समर्थन करना जारी रखना चाहिए जबकि नेताओं पर नागरिकों की रक्षा करने के लिए दबाव डालना चाहिए।

स्रोत: The Hindu

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