चर्चा में क्यों?
न्यूरोलॉजी (Neurology) में प्रकाशित और अप्रैल 2026 की शुरुआत में रिपोर्ट किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि 30 और 40 के दशक में उच्च विटामिन डी स्तर वाले लोगों के मस्तिष्क में कई साल बाद टाउ प्रोटीन (tau protein) का जमाव कम था। टाउ अल्जाइमर रोग (Alzheimer’s disease) से जुड़ा एक बायोमार्कर है। शोध से पता चलता है कि मध्य जीवन (midlife) के दौरान पर्याप्त विटामिन डी बनाए रखना दीर्घकालिक मस्तिष्क स्वास्थ्य में योगदान दे सकता है।
पृष्ठभूमि
विटामिन डी एक वसा में घुलनशील (fat-soluble) हार्मोन है जो सूर्य के प्रकाश के संपर्क में आने पर त्वचा में संश्लेषित (synthesised) होता है और वसायुक्त मछली (fatty fish), अंडे की जर्दी (egg yolks) और फोर्टिफाइड खाद्य पदार्थों (fortified foods) जैसे आहार स्रोतों से प्राप्त होता है। यह कैल्शियम अवशोषण (calcium absorption), अस्थि खनिजकरण (bone mineralisation), प्रतिरक्षा कार्य (immune function) और कोशिका वृद्धि विनियमन (cell growth regulation) में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भारत में, व्यापक कमी को "मौन महामारी" (silent epidemic) करार दिया गया है। अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संबंधों पर अनुसंधान के लिए भारतीय परिषद (ICRIER) की 2025 की एक रिपोर्ट का अनुमान है कि 20% से अधिक भारतीयों में विटामिन डी का स्तर बहुत कम है, पूर्वी राज्यों में प्रसार 38% से अधिक है। सीमित सूर्य का संपर्क, वायु प्रदूषण, गतिहीन जीवन शैली (sedentary lifestyles), आहार में अंतराल और परीक्षण और सप्लीमेंट्स (supplements) की उच्च लागत इसके प्रमुख कारण हैं।
2026 के अध्ययन से प्रमुख निष्कर्ष
- दीर्घकालिक समूह (Long-term cohort): शोधकर्ताओं ने लगभग 16 वर्षों तक 793 वयस्कों का अनुसरण किया। जब वे शामिल हुए थे तब प्रतिभागी लगभग 39 वर्ष के थे और उन्हें शुरुआत में डिमेंशिया (dementia) नहीं था।
- विटामिन डी का स्तर: रक्त परीक्षणों ने आधार रेखा (baseline) पर एक बार विटामिन डी को मापा। 30 एनजी/एमएल (ng/mL) से ऊपर के स्तर को उच्च माना गया, जबकि निचले स्तर को अपर्याप्त (inadequate) माना गया।
- ब्रेन स्कैन (Brain scans): लगभग 16 साल बाद, प्रतिभागियों ने टाउ और एमाइलॉयड बीटा प्रोटीन (amyloid beta proteins) को मापने के लिए पीईटी स्कैन (PET scans) करवाया। उच्च आधार रेखा विटामिन डी स्तर वाले लोगों में टाउ का बोझ काफी कम था, लेकिन एमाइलॉयड बीटा में कोई स्पष्ट अंतर नहीं था।
- व्याख्या (Interpretation): अध्ययन जुड़ाव (association) को दर्शाता है, कारण (causation) का प्रमाण नहीं। शोधकर्ताओं ने आगाह किया है कि केवल विटामिन डी डिमेंशिया को नहीं रोक सकता है लेकिन यह कई लोगों के बीच एक परिवर्तनीय कारक (modifiable factor) हो सकता है।
भारत में विटामिन डी की स्थिति
- कमी का प्रसार: ICRIER के अध्ययन में पाया गया कि पांच में से एक भारतीय गंभीर कमी से पीड़ित है। शहरी निवासी, महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग विशेष रूप से कमजोर हैं।
- स्वास्थ्य परिणाम: बच्चों में, कमी से रिकेट्स (rickets) होता है, जिससे हड्डियां नरम हो जाती हैं और कंकाल की विकृति (skeletal deformities) होती है। वयस्कों में यह ऑस्टियोमलेशिया (osteomalacia), मांसपेशियों में कमजोरी और फ्रैक्चर के बढ़ते जोखिम का कारण बन सकता है। उभरते शोध कमी को अवसाद (depression), हृदय रोग और प्रतिरक्षा शिथिलता (immune dysfunction) से जोड़ते हैं।
- स्रोत और सिफारिशें: भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) अधिकांश वयस्कों के लिए प्रति दिन 400-600 आईयू (IU) विटामिन डी की सिफारिश करती है। सुरक्षित धूप में निकलना (सनस्क्रीन के बिना) 15-30 मिनट के लिए सप्ताह में कई बार और तैलीय मछली, मशरूम, फोर्टिफाइड दूध और सप्लीमेंट जैसे खाद्य पदार्थों का सेवन मदद कर सकता है। हालांकि, कई लोगों के लिए परीक्षण और सप्लीमेंट महंगे बने हुए हैं; 10 गोलियों की एक बोतल की कीमत ₹50-130 हो सकती है, और परीक्षण अक्सर ₹1,500 से अधिक होते हैं।
महत्व
- सार्वजनिक स्वास्थ्य जागरूकता: विटामिन डी को मस्तिष्क के स्वास्थ्य से जोड़ने वाले अध्ययन जागरूकता अभियानों की आवश्यकता को सुदृढ़ करते हैं। पीएम पोषण (मध्याह्न भोजन योजना) जैसे पोषण कार्यक्रमों में विटामिन डी को एकीकृत करने से कमजोर समूहों के लिए परिणामों में सुधार हो सकता है।
- नीतिगत कार्रवाई: विशेषज्ञ एक राष्ट्रीय रणनीति की सलाह देते हैं जिसमें मुख्य खाद्य पदार्थों के अनिवार्य फोर्टिफिकेशन (mandatory fortification), सब्सिडी वाले परीक्षण, सस्ती सप्लीमेंट्स और गर्भवती महिलाओं, शिशुओं और बुजुर्गों के लिए लक्षित पूरकता शामिल है।
- जीवनशैली के विकल्प: बाहरी शारीरिक गतिविधि को प्रोत्साहित करना, वायु प्रदूषण को कम करना और विविध आहार को बढ़ावा देना कमी के अंतर्निहित कारणों को संबोधित कर सकता है।
निष्कर्ष
2026 का अध्ययन साक्ष्य के बढ़ते शरीर में जोड़ता है कि पर्याप्त विटामिन डी केवल हड्डियों से अधिक लाभान्वित करता है। भारत में, जहां कमी व्यापक है, सूरज के संपर्क, फोर्टिफिकेशन और सस्ती खुराक के माध्यम से इस पोषक तत्व की कमी को दूर करने से सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार हो सकता है और संभावित रूप से जीवन में बाद में संज्ञानात्मक कल्याण (cognitive well-being) का समर्थन मिल सकता है।
स्रोत: NDTV