कला और संस्कृति

Arhat Relics in Mongolia: Sariputra, Mahamoggallana और सांची स्तूप

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चर्चा में क्यों?

31 मई 2026 को भारत ने सांची स्तूप (Sanchi Stupa) से अर्हत सारिपुत्र (Arhat Sariputra) और अर्हत महामोग्गल्लाना (Arhat Mahamoggallana) के पवित्र अवशेषों (sacred relics) को उलानबटोर (Ulaanbaatar) भेजा। दस दिनों तक उन्हें गंडानतेगचिनलिंग मठ (Gandantegchinling Monastery) में प्रतिष्ठित किया गया, जिससे मंगोलियाई भक्तों को श्रद्धांजलि देने का एक दुर्लभ अवसर मिला। यह केवल दूसरी बार था जब अवशेषों को विदेश ले जाया गया था - पहली बार 2024 में - और इस घटना ने भारत और मंगोलिया के बीच प्राचीन सांस्कृतिक बंधन (ancient cultural bond) का जश्न मनाया।

पृष्ठभूमि

सारिपुत्र और महामोग्गल्लाना गौतम बुद्ध (Gautama Buddha) के सबसे आदरणीय शिष्यों में से दो थे। प्राचीन बौद्ध ग्रंथ (Ancient Buddhist texts) सारिपुत्र को ज्ञान में अतुलनीय और महामोग्गल्लाना को चमत्कारी शक्तियों में सबसे आगे बताते हैं। 5वीं शताब्दी ईसा पूर्व में उनके निधन के बाद, उनके अवशेषों को भारतीय उपमहाद्वीप में स्तूपों (stupas) में प्रतिष्ठित किया गया था। तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में सम्राट अशोक (Emperor Ashoka) द्वारा निर्मित भोपाल के पास सांची स्तूप (Sanchi Stupa) में 1850 के दशक में ब्रिटिश उत्खनन (British excavations) के दौरान खोजे गए अवशेष थे। इन अवशेषों को भारत में संरक्षित किया गया था और कभी-कभी जनता के लिए प्रदर्शित किया जाता था।

मंगोलिया ने 16वीं शताब्दी में बौद्ध धर्म (Buddhism) अपनाया और आस्था के जन्मस्थान के रूप में भारत की ओर देखता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 2015 की मंगोलिया यात्रा के दौरान, भारत ने स्थिति अनुकूल होने पर इन अवशेषों को भेजने का वादा किया था। मंगोलिया के प्रमुख मठ, गंडानतेगचिनलिंग मठ (Gandantegchinling Monastery) में प्रदर्शनी का आयोजन भारत सरकार, संस्कृति मंत्रालय (Ministry of Culture) और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (Archaeological Survey of India) द्वारा किया गया था। भारतीय वायु सेना (Indian Air Force) के एक विमान ने भिक्षुओं और अधिकारियों के साथ विशेष ताबूतों में अवशेषों को पहुँचाया।

प्रदर्शनी की मुख्य बातें

  • सभ्यतागत संबंध (Civilisational ties): इस प्रदर्शन ने भारत और मंगोलिया के बीच सदियों पुराने आध्यात्मिक संबंधों (spiritual links) को रेखांकित किया। मंगोलियाई नेताओं ने अवशेषों को बुद्ध की शिक्षाओं के "जीवित दूत (living messengers)" के रूप में वर्णित किया।
  • दुर्लभ तीर्थयात्रा: पूरे मंगोलिया से भक्त सम्मान देने के लिए मठ में कतार में लगे रहे। अवशेषों को आमतौर पर नई दिल्ली में राष्ट्रीय संग्रहालय (National Museum) में रखा जाता है और केवल दो बार विदेश यात्रा कर चुके हैं।
  • कलाकृति प्रदर्शन (Artefact display): अवशेषों के साथ-साथ बुद्ध के जीवन को दर्शाने वाली बीस वस्तुएं - जैसे मूर्तियां और पांडुलिपियां (manuscripts) - प्रदर्शित की गईं। दस दिवसीय कार्यक्रम के दौरान भिक्षुओं ने प्रार्थनाओं का जाप किया और औपचारिक दीपक (ceremonial lamps) चढ़ाए।
  • बंधनों को मजबूत करना: दोनों देशों के नेताओं ने ध्यान दिया कि प्रदर्शनी ने भारत की "आध्यात्मिक पड़ोस (spiritual neighbourhood)" नीति का जश्न मनाया। यह राजनयिक संबंधों (diplomatic relations) के 70 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में कार्यक्रमों के साथ भी हुआ।

निष्कर्ष

मंगोलिया में सारिपुत्र और महामोग्गल्लाना के अवशेषों के प्रदर्शन ने दुनिया को भारत में बौद्ध धर्म (Buddhism) की गहरी जड़ों और मध्य एशिया (Central Asia) में इसकी निरंतर गूंज की याद दिला दी। धार्मिक भक्ति (religious devotion) से परे, इस तरह के सांस्कृतिक आदान-प्रदान (cultural exchanges) सद्भावना और आपसी सम्मान को बढ़ावा देते हैं। जैसे-जैसे भारत और मंगोलिया अपनी साझेदारी को गहरा करते हैं, साझा विरासत (shared heritage) को बढ़ावा देने से लोगों से लोगों के बीच स्थायी संबंध (people‑to‑people connections) बन सकते हैं।

स्रोत

PIB

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