समाचार में क्यों?
राष्ट्रीय नेताओं ने क्रांतिकारी बटुकेश्वर दत्त को उनकी पुण्यतिथि पर याद किया। उनका निधन 20 July 1965 को हुआ था। उन्हें 1929 के Central Legislative Assembly बमबारी के लिए जाना जाता है।
पृष्ठभूमि
बटुकेश्वर दत्त का जन्म 18 November 1910 को बंगाल के बर्दवान क्षेत्र में हुआ था।
बटुकेश्वर दत्ता या बी. के. दत्त के नाम से भी पुकारे जाने वाले, उन्होंने बाद में कानपुर में पढ़ाई की।
वहां उनकी मुलाकात 1924 के दौरान भगत सिंह से हुई और वे उनके क्रांतिकारी घेरे में शामिल हो गए।
गणतांत्रिक संघ से समाजवादी संघ तक
औपनिवेशिक शासन के खिलाफ संघर्ष को व्यवस्थित करने के लिए क्रांतिकारियों ने 1924 में Hindustan Republican Association की स्थापना की।
सदस्यों ने 1928 के दौरान इसे पुनर्गठित किया और इसके नाम में "Socialist" जोड़ा।
इसके बाद यह Hindustan Socialist Republican Association बन गया, जिसे आमतौर पर HSRA कहा जाता है।
दत्त ने इस संगठन के साथ काम किया और विस्फोटकों की तकनीकी तैयारी सीखी।
असेंबली में बमबारी क्यों हुई?
औपनिवेशिक सरकार 1929 के दौरान दो विवादित विधेयकों को आगे बढ़ा रही थी।
- Public Safety Bill ने चयनित राजनीतिक कार्यकर्ताओं के खिलाफ कड़े नियंत्रण की मांग की।
- Trade Disputes Bill ने मजदूर कार्रवाई को प्रतिबंधित किया और राज्य के हस्तक्षेप को मजबूत किया।
HSRA ने Central Legislative Assembly के अंदर एक नाटकीय विरोध प्रदर्शन की योजना बनाई।
असेंबली की बैठक उस इमारत में हुई जिसे अब पुराना संसद भवन कहा जाता है।
8 अप्रैल 1929 को क्या हुआ था?
भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने कक्ष के अंदर दो कम तीव्रता वाले बम फेंके।
विस्फोटों से चोटें आईं, हालांकि नियोजित कार्रवाई का ध्यान प्रचार पर केंद्रित था।
उन्होंने राजनीतिक पर्चे फेंके और "इंकलाब जिंदाबाद" के नारे लगाए, जिसका अर्थ है "क्रांति अमर रहे"।
दोनों व्यक्ति घटनास्थल पर ही रुके रहे और भागने के बजाय आत्मसमर्पण कर दिया।
उनका इरादा अपने राजनीतिक विचारों को समझाने के लिए मुकदमे का उपयोग करने का था।
मामलों में भ्रमित न हों: दत्त ने असेंबली बम कांड (Assembly Bomb Case) का सामना किया। भगत सिंह ने अलग से लाहौर षड्यंत्र कांड (Lahore Conspiracy Case) का सामना किया।
मुकदमा और सजा
राष्ट्रवादी वकील आसफ अली ने उनका बचाव किया, लेकिन अदालत ने दोनों व्यक्तियों को हत्या के प्रयास सहित कई अपराधों का दोषी ठहराया।
इसने उन्हें June 1929 के दौरान आजीवन कारावास (transportation for life) की सजा सुनाई, जिसका अर्थ था घर से दूर लंबी कैद।
दत्त को अंततः अंडमान द्वीप समूह की सेलुलर जेल (Cellular Jail) भेज दिया गया।
जेल में भूख हड़ताल
औपनिवेशिक जेलें भारतीय राजनीतिक कैदियों के साथ कई यूरोपीय कैदियों की तुलना में अलग व्यवहार करती थीं।
शिकायतों में खराब भोजन, अपमानजनक श्रम, अस्वच्छ स्थितियां और प्रतिबंधित पठन सामग्री शामिल थी।
दत्त और भगत सिंह ने समान और मानवीय व्यवहार के लिए भूख हड़ताल शुरू की।
जवाहरलाल नेहरू ने 5 July 1929 को सार्वजनिक रूप से उनकी हड़ताल पर चर्चा की।
उन्होंने उल्लेख किया कि उनकी मांगें सभी राजनीतिक कैदियों के उपचार से संबंधित थीं।
इस अभियान ने औपनिवेशिक जेलों के अंदर की स्थितियों की ओर राष्ट्रीय ध्यान आकर्षित किया।
स्वतंत्रता संग्राम के बाद के वर्ष
- दत्त ने सेल्युलर जेल और कई मुख्य भूमि की जेलों में वर्षों बिताए।
- अधिकारियों ने उन्हें 1938 के दौरान रिहा कर दिया, लेकिन वे 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन (Quit India Movement) में शामिल हो गए।
- औपनिवेशिक अधिकारियों ने उन्हें फिर से गिरफ्तार कर लिया और उन पर आगे की कैद थोप दी।
- आजादी के बाद, वे मुख्य रूप से अपने परिवार के साथ पटना में रहे।
दत्त का लंबी बीमारी के बाद नई दिल्ली के All India Institute of Medical Sciences में निधन हो गया।
उनका अंतिम संस्कार हुसैनीवाला में हुआ, जो भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की भी याद दिलाता है।
उनका योगदान महत्वपूर्ण क्यों है?
दत्त का जीवन दर्शाता है कि क्रांतिकारी राजनीति में विचार, संगठन और जेल प्रतिरोध शामिल थे।
उनके लगातार कारावास ने उनके रास्ते को भगत सिंह से अलग कर दिया और इतिहास को अधिक प्रसिद्ध साथियों से परे विस्तृत किया।
निष्कर्ष
बटुकेश्वर दत्त ने कारावास को प्रतिरोध में बदल दिया, क्रांतिकारी कार्रवाई को औपनिवेशिक जेलों के अंदर गरिमा की मांगों से जोड़ा।