पर्यावरण

कोटगढ़ अभयारण्य: ओडिशा वन्यजीव, संरक्षण

कोटगढ़ अभयारण्य: ओडिशा वन्यजीव, संरक्षण

खबरों में क्यों?

ओडिशा के वन अधिकारियों ने हाल ही में कोटगढ़ वन्यजीव अभयारण्य (Kotgarh Wildlife Sanctuary) में चार संदिग्ध शिकारियों (poachers) को गिरफ्तार किया। इन लोगों को बंदूकें, गोला-बारूद और बारूद के साथ पकड़ा गया था और कथित तौर पर जानवरों को बाहर निकालने के लिए उन्होंने जंगल में आग लगाने का प्रयास किया था। इस घटना ने अभयारण्य की समृद्ध जैव विविधता और अवैध शिकार से होने वाले खतरों की ओर ध्यान आकर्षित किया है।

पृष्ठभूमि

कोटगढ़ वन्यजीव अभयारण्य ओडिशा के कंधमाल (Kandhamal) जिले के बालीगुडा (Baliguda) उपखंड में स्थित है। लगभग 399 वर्ग किलोमीटर में फैला यह पूर्वी हाइलैंड्स (Eastern Highlands) नम पर्णपाती जंगल का हिस्सा है और इसमें कुटिया कोंध (Kutia Kondh) और देसिया कोंध (Desia Kondh) समुदायों के लगभग 52 आदिवासी गांव शामिल हैं। अभयारण्य के घने जंगल और घुमावदार पहाड़ियाँ वनस्पतियों और जीवों की एक विस्तृत विविधता का समर्थन करती हैं, जिससे यह पूर्वी भारत में एक महत्वपूर्ण संरक्षण क्षेत्र बन जाता है।

अभयारण्य की पारिस्थितिकी (Ecology)

  • वनस्पति: 650 से अधिक पौधों की प्रजातियों को दर्ज किया गया है, जिनमें साल (Shorea robusta), पियासल, सिसू, केंडू, गम्हार, आसन और कुसुम जैसी प्रमुख पेड़ों की प्रजातियां शामिल हैं। आम, इमली, महुआ और कटहल जैसे फल देने वाले पेड़ वन्यजीवों और स्थानीय समुदायों को भोजन प्रदान करते हैं। यह अभयारण्य Abutilon indicum और Cycas sphaerica जैसे कई दुर्लभ औषधीय पौधों का घर है।
  • जीव-जंतु: बाघ, तेंदुए, स्लोथ भालू, हाथी, गौर, सांभर हिरण और काकड़ (barking deer) जैसे स्तनधारी जंगलों में घूमते हैं। यह अभयारण्य चौसिंगा (four-horned antelope) के लिए जाना जाता है, जो कहीं और शायद ही कभी देखा जाता है। मोर और लाल जंगली मुर्गियां (red jungle fowl) जैसे पक्षी विविधता को बढ़ाते हैं।
  • आदिवासी समुदाय: स्वदेशी लोग पारंपरिक रूप से गैर-इमारती वन उत्पादों (non-timber forest products) के लिए जंगल पर निर्भर हैं और निर्दिष्ट क्षेत्रों में स्थानांतरित खेती (shifting cultivation) का अभ्यास करते हैं। उनकी सांस्कृतिक प्रथाओं में पवित्र उपवन (sacred groves) और सामुदायिक संरक्षण पहल शामिल हैं।

चुनौतियाँ और संरक्षण के प्रयास

  • अवैध शिकार और आवास का नुकसान: अवैध शिकार और भूमि अतिक्रमण (land encroachment) वन्यजीवों के लिए खतरा हैं। जानवरों को बाहर निकालने के लिए शिकारियों द्वारा लगाई गई जंगल की आग वनस्पतियों और घोंसले बनाने के स्थानों को नष्ट कर सकती है।
  • मानव-वन्यजीव संघर्ष: हाथी और अन्य बड़े जानवर कभी-कभी फसलों पर छापा मारते हैं, जिससे ग्रामीणों के साथ संघर्ष होता है। मुआवजा योजनाओं (Compensation schemes) और जागरूकता कार्यक्रमों का उद्देश्य इन तनावों को कम करना है।
  • इको-टूरिज्म की संभावना: उचित प्रबंधन के साथ, समुदाय-आधारित पर्यटन संरक्षण को बढ़ावा देते हुए आय उत्पन्न कर सकता है। आधारभूत संरचना का विकास (Infrastructure development) पारिस्थितिक सीमाओं के प्रति संवेदनशील होना चाहिए।

निष्कर्ष

कोटगढ़ वन्यजीव अभयारण्य एक जैव विविधता हॉटस्पॉट और एक सांस्कृतिक परिदृश्य है। हाल की गिरफ्तारियां वन्यजीव संरक्षण कानूनों को सख्ती से लागू करने, संरक्षण में सामुदायिक भागीदारी और स्थानीय लोगों के लिए स्थायी आजीविका (sustainable livelihoods) की आवश्यकता को रेखांकित करती हैं। इस अभयारण्य की रक्षा करने से भविष्य की पीढ़ियों के लिए पूर्वी भारत की समृद्ध प्राकृतिक विरासत को संरक्षित करने में मदद मिलेगी।

स्रोत: Times of India

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