समाचार में क्यों?
Geographical Indications (GI) Registry ने हाल ही में मध्य प्रदेश के आदिवासी समुदायों द्वारा उगाई जाने वाली चार पारंपरिक फसलों के लिए GI tags को मंज़ूरी दी है। इनमें बाजरा (millet) की दो किस्में, एक अरहर (pigeon‑pea) और एक चावल की किस्म शामिल हैं। यह मान्यता इन फसलों को नकल से बचाने में मदद करेगी और आदिवासी किसानों की आय बढ़ाएगी।
पृष्ठभूमि
Geographical Indication एक लेबल है जिसका उपयोग उन उत्पादों पर किया जाता है जो किसी विशिष्ट स्थान से उत्पन्न होते हैं और जिनमें उस क्षेत्र से जुड़े गुण होते हैं। भारत का GI शासन Geographical Indications of Goods (Registration and Protection) Act 1999 द्वारा शासित है। एक बार उत्पाद पंजीकृत हो जाने के बाद, केवल उस क्षेत्र के अधिकृत उपयोगकर्ता ही नाम का उपयोग कर सकते हैं।
फसलों का मुख्य विवरण
- Sitahi Kutki और Nagdaman Kutki – छोटे बाजरे (little millet) की ये दो किस्में मध्य भारत में बैगा और गोंड जनजातियों द्वारा उगाई जाती हैं। ये सूखा-सहिष्णु (drought-tolerant) हैं और आहार फाइबर (dietary fibre) और जटिल कार्बोहाइड्रेट (complex carbohydrates) से भरपूर हैं। किसानों ने पीढ़ियों से सामुदायिक बीज बैंकों के माध्यम से बीजों को संरक्षित किया है।
- Baigani Arhar – बैंगनी फली और बीज के साथ एक पारंपरिक अरहर (pigeon-pea) की किस्म। इसमें उच्च प्रोटीन सामग्री और एक मीठा स्वाद होता है। पौधा लंबा होता है और आम बीमारियों का विरोध कर सकता है।
- Mahakoshal Chhatriya Chawal – इसे Chhatriya Dhan के रूप में भी जाना जाता है, जबलपुर और कटनी जिलों के इस स्वदेशी चावल में एक अलग सुगंध के साथ लम्बे दाने होते हैं। यह अक्सर काला या लाल रंग का दिखाई देता है और खनिजों से भरपूर होता है। चावल का उपयोग स्थानीय अनुष्ठानों और त्योहारों में किया जाता है।
- जबलपुर में जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय ने आदिवासी किसानों के परामर्श से अपने GI Cell के माध्यम से GI आवेदन तैयार किए।
- GI सुरक्षा इन नामों के दुरुपयोग को रोकेगी और विशिष्ट बाज़ारों में उच्च कीमतें प्राप्त कर सकती है। यह फसल विविधता के संरक्षण में आदिवासी समुदायों की भूमिका को भी मान्यता देता है।
निष्कर्ष
Sitahi Kutki, Nagdaman Kutki, Baigani Arhar और Mahakoshal Chhatriya Chawal के लिए GI tags इन पारंपरिक फसलों को सुरक्षित रखने में मदद करेंगे। यह मान्यता बैगा और गोंड जनजातियों की सांस्कृतिक विरासत को स्वीकार करती है और पौष्टिक, जलवायु-अनुकूल (climate-resilient) खाद्य पदार्थों की खेती को प्रोत्साहित करती है।
स्रोत: TOI