Social (सामाजिक)

NAAC Transition: उच्च शिक्षा आयोग, प्रत्यायन और UGC

NAAC Transition: उच्च शिक्षा आयोग, प्रत्यायन और UGC

चर्चा में क्यों?

शैक्षणिक वर्ष 2025-26 के दौरान, भारत के किसी भी विश्वविद्यालय या कॉलेज को राष्ट्रीय मूल्यांकन और प्रत्यायन परिषद (National Assessment and Accreditation Council - NAAC) से नया मान्यता (fresh accreditation) प्राप्त नहीं हुआ। यह विराम इसलिए आया क्योंकि उच्च शिक्षा नियामक (higher‑education regulator) प्रस्तावित विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान (Viksit Bharat Shiksha Adhishthan) विधेयक के तहत अपने मान्यता ढांचे (accreditation framework) में बदलाव (overhauling) कर रहा है।

पृष्ठभूमि (Background)

NAAC की स्थापना 1994 में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (University Grants Commission - UGC) द्वारा उच्च शिक्षा संस्थानों (higher‑education institutions) का मूल्यांकन (assess) और प्रत्यायन (accredit) करने के लिए की गई थी। यह पाठ्यक्रम, शिक्षण, अनुसंधान, बुनियादी ढांचे, छात्र समर्थन और शासन (governance) पर संस्थानों का मूल्यांकन करता है। मान्यता स्वैच्छिक (voluntary) है लेकिन वित्त पोषण (funding) और प्रतिष्ठा (reputation) के लिए तेजी से महत्वपूर्ण हो गई है। भारत के 20 प्रतिशत से भी कम कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के पास वर्तमान में NAAC मान्यता है।

विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक का उद्देश्य नियमन (regulation), प्रत्यायन और शैक्षणिक मानकों (academic standards) की देखरेख के लिए एक एकल भारतीय उच्च शिक्षा आयोग (Higher Education Commission of India) बनाना है। यह नियमन, प्रत्यायन और मानकों के लिए अलग-अलग परिषदों (councils) का प्रस्ताव करता है जो UGC, AICTE और राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद (National Council for Teacher Education) जैसे मौजूदा निकायों (existing bodies) की जगह लेंगी। इस बदलाव का उद्देश्य शासन को सरल बनाना, गुणवत्ता में सुधार करना और दोहराव (duplication) को कम करना है।

मुद्दे और परिवर्तन (Issues and transition)

  • अस्थायी रोक (Temporary halt): मान्यता प्रक्रिया को नया रूप दिए जाने के कारण NAAC ने नए आवेदन लेना बंद कर दिया। अधिकारियों को उम्मीद है कि नए कानून के तहत दिशानिर्देशों को अंतिम रूप (finalised) दिए जाने के बाद सिस्टम फिर से शुरू हो जाएगा।
  • भ्रष्टाचार की चिंताएं (Corruption concerns): उच्च ग्रेड देने के लिए कथित रिश्वत (bribery) की केंद्रीय ब्यूरो की जांच ने मान्यता में और देरी की है। नया ढांचा मानवीय विवेक (human discretion) को कम करने के लिए सख्त निगरानी और डिजिटल प्रक्रियाओं का वादा करता है।
  • गुणवत्ता आश्वासन में अंतर (Gap in quality assurance): कोई नई मान्यता नहीं होने से, कुछ संस्थानों को अनुदान प्राप्त करने (accessing grants) या छात्रों को आकर्षित करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि, संक्रमण के दौरान मौजूदा ग्रेड मान्य (valid) रहते हैं।
  • भविष्य का मॉडल (Future model): मान्यता को अनुसंधान उत्पादकता, शिक्षण गुणवत्ता और रोजगार क्षमता (employability) जैसे परिणामों (outcomes) पर जोर देने के साथ अनिवार्य (mandatory) और निरंतर (continuous) बनाया जा सकता है। डेटा एनालिटिक्स और छात्रों की प्रतिक्रिया (student feedback) द्वारा सहकर्मी-समीक्षा टीमों (Peer‑review teams) को पूरक किया जा सकता है।

महत्व (Significance)

  • मानकों को ऊपर उठाना (Raising standards): एक समान, पारदर्शी मान्यता प्रणाली संस्थानों को अकादमिक गुणवत्ता और शासन में सुधार करने के लिए प्रेरित कर सकती है।
  • शासन को सुव्यवस्थित करना (Streamlining governance): कई नियामकों (regulators) को एक आयोग में समेकित (Consolidating) करने से ओवरलैप (overlap) कम होता है और जवाबदेही (accountability) स्पष्ट होती है।
  • विश्वसनीयता बढ़ाना (Enhancing credibility): अनियमितताओं (irregularities) के आरोपों को संबोधित करने से मान्यता परिणामों (accreditation outcomes) में विश्वास बहाल हो सकता है।

निष्कर्ष (Conclusion)

NAAC का पुनरुद्धार (revamp) अपनी उच्च शिक्षा प्रणाली (higher‑education system) को आधुनिक बनाने की भारत की महत्वाकांक्षा (ambition) को दर्शाता है। हालांकि मान्यता में विराम अल्पावधि चुनौतियों (short‑term challenges) का कारण बनता है, प्रस्तावित उच्च शिक्षा आयोग के तहत एक मजबूत और पारदर्शी ढांचा भारतीय विश्वविद्यालयों की बेहतर गुणवत्ता (better quality) और वैश्विक पहचान (global recognition) की ओर ले जा सकता है।

स्रोत: The New Indian Express

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