समाचार में क्यों?
5 July 2026 को वयोवृद्ध पंडवानी गायिका तीजन बाई का 69 वर्ष की आयु में रायपुर में निधन हो गया। वह छत्तीसगढ़ी मौखिक परंपरा की सबसे प्रसिद्ध प्रतिपादक थीं, जो महाभारत के प्रसंगों का वर्णन करती हैं। उनके निधन पर पूरे भारत में शोक व्यक्त किया गया, जिसने लोक कलाओं को संरक्षित करने की आवश्यकता को उजागर किया। Prime Minister सहित कई कलाकारों और नेताओं ने उन्हें श्रद्धांजलि दी।
पृष्ठभूमि
पंडवानी छत्तीसगढ़ क्षेत्र की एक कथा गायन शैली है। कलाकार महाभारत की कहानियों को गाते और उनका नाट्य रूपांतरण करते हैं, जो अक्सर पांडवों पर केंद्रित होती हैं। इसकी दो मुख्य शैलियाँ हैं: वेदमती शैली में बैठकर एक तार वाले एकतारा के साथ गाना शामिल है, जबकि कपालिक शैली में गायक खड़ा होकर तंबूरा का उपयोग हथियारों या रथों को दर्शाने के लिए एक प्रप के रूप में करता है। संगीत में ढोलक, हारमोनियम और मंजीरे जैसे वाद्य यंत्रों का उपयोग होता है। परंपरागत रूप से, इस कला का प्रदर्शन दलित पुरुष गायकों द्वारा किया जाता था, और महिलाओं को सामाजिक बाधाओं का सामना करना पड़ता था।
तीजन बाई का योगदान
- बाधाओं को तोड़ना: पारधी आदिवासी समुदाय में जन्मीं तीजन बाई ने 13 साल की उम्र में अपने दादा से पंडवानी सीखी और वह प्रदर्शन करने वाली पहली महिलाओं में से एक बनीं।
- विशिष्ट शैली: उन्होंने कपालिक शैली को लोकप्रिय बनाया, जिसमें तंबूरा का उपयोग दृश्यों के अभिनय के लिए किया जाता था। मंच पर उनकी ऊर्जावान उपस्थिति और शक्तिशाली आवाज़ ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
- वैश्विक पहचान: पांच दशकों के करियर में, उन्होंने फ्रांस, स्विट्जरलैंड, जर्मनी, इंग्लैंड, माल्टा, साइप्रस, ट्यूनीशिया, इटली, यमन, बांग्लादेश और मॉरीशस सहित कई देशों में प्रदर्शन किया।
- पुरस्कार: उन्हें 1988 में पद्म श्री, 1995 में Sangeet Natak Akademi award, 2003 में पद्म भूषण और 2019 में पद्म विभूषण प्राप्त हुआ—जो छत्तीसगढ़ के किसी भी व्यक्ति को दिया गया सर्वोच्च नागरिक सम्मान है।
- विरासत: तीजन बाई ने कई युवा कलाकारों को प्रशिक्षित किया और कभी गुमनाम रही इस लोक कला को राष्ट्रीय मंचों और टेलीविज़न तक पहुंचाया। उन्होंने अन्य महिला कलाकारों के लिए मार्ग प्रशस्त किया।
निष्कर्ष
तीजन बाई का निधन पंडवानी के एक युग के अंत का प्रतीक है। उनके जीवन की कहानी दिखाती है कि कैसे प्रतिभा और दृढ़ संकल्प जाति और लिंग संबंधी पूर्वाग्रहों को दूर कर सकते हैं। भारत की सांस्कृतिक विविधता के लिए पंडवानी जैसी लोक परंपराओं का संरक्षण और प्रचार महत्वपूर्ण है।