ख़बरों में क्यों?
24 जून 2026 को एक समाचार रिपोर्ट में पता चला कि जनवरी में महाराष्ट्र के मेलघाट टाइगर रिज़र्व (Melghat Tiger Reserve) में छोड़े गए एक कैप्टिव-ब्रेड (captive-bred) लंबी चोंच वाले गिद्ध (long-billed vulture) ने मध्य भारत में 3,334 किलोमीटर की यात्रा की और राजस्थान के रणथंभौर टाइगर रिज़र्व (Ranthambhore Tiger Reserve) पहुंच गया। X67 टैग वाला यह पक्षी पूरक आहार (supplemental feeding) के बिना जीवित रहा और रास्ते में सतपुड़ा टाइगर रिज़र्व और कूनो नेशनल पार्क में रुका। संरक्षणवादियों ने इस यात्रा को इस बात के प्रमाण के रूप में सराहा कि फिर से पेश किए गए गिद्ध (reintroduced vultures) जंगली परिस्थितियों के अनुकूल हो सकते हैं और लंबी दूरी पर मरे हुए जानवरों (carrion) का पता लगा सकते हैं।
पृष्ठभूमि
रणथंभौर टाइगर रिज़र्व दक्षिण-पूर्वी राजस्थान के सवाई माधोपुर जिले में अरावली और विंध्य पर्वतमाला (Aravalli and Vindhyan ranges) के जंक्शन पर स्थित है। यह लगभग 1,411 वर्ग किलोमीटर में फैला है और इसमें ऐतिहासिक रणथंभौर किला (Ranthambhore Fort) शामिल है। कभी जयपुर के राजघरानों का निजी शिकारगाह रहा यह क्षेत्र 1955 में वन्यजीव अभयारण्य बन गया और 1973 में इसे प्रोजेक्ट टाइगर (Project Tiger) में शामिल कर लिया गया। पार्क के शुष्क पर्णपाती जंगल (dry deciduous forests), झीलें और चट्टानी पठार बाघों, तेंदुओं, काराकल, हिरण, जंगली सूअर और तीन सौ से अधिक पक्षी प्रजातियों का समर्थन करते हैं। पशु चिकित्सा दवा डिक्लोफेनाक (diclofenac) के कारण 1990 के दशक में भारत भर में गिद्धों की आबादी में भारी गिरावट आई, जिसके कारण बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (Bombay Natural History Society) और वन विभागों द्वारा प्रजनन कार्यक्रम (breeding programmes) चलाए गए।
गिद्ध की यात्रा के मुख्य आकर्षण
- कैप्टिव ब्रीडिंग (Captive breeding): मेलघाट फैसिलिटी में पंद्रह लंबी चोंच वाले गिद्धों को पाला गया और उन्हें सौर-संचालित ट्रैकिंग टैग (solar-powered tracking tags) लगाए गए। X67 को 2 जनवरी 2026 को छोड़ा गया था।
- लंबी दूरी की उड़ान: रिलीज़ साइट के पास चार महीने बिताने के बाद, पक्षी ने 28 मई को अपनी यात्रा शुरू की और महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और राजस्थान से होते हुए आगे बढ़ा। इसने सत्ताईस दिनों में 3,334 किलोमीटर की दूरी तय की।
- संरक्षित क्षेत्रों का उपयोग: रणथंभौर पहुंचने से पहले गिद्ध ने सतपुड़ा टाइगर रिज़र्व और कूनो नेशनल पार्क में विश्राम किया। संरक्षणवादियों का कहना है कि यह मार्ग दर्शाता है कि गिद्ध ऐसे संरक्षित परिदृश्यों (protected landscapes) की तलाश करते हैं जहां मृत जानवर (carcasses) उपलब्ध हों और गड़बड़ी (disturbance) कम हो।
- संरक्षण मूल्य: कैप्टिव-ब्रेड गिद्धों का सफल अनुकूलन (adaptation) गंभीर रूप से लुप्तप्राय प्रजातियों (critically endangered species) की आबादी को बहाल करने की उम्मीद देता है। डिक्लोफेनाक के कारण भारत में गिद्धों की आबादी 90 प्रतिशत से अधिक कम हो गई; पुनरुत्पादन (reintroduction) और सुरक्षित पशु चिकित्सा पद्धतियां धीरे-धीरे इस प्रवृत्ति को उलट रही हैं।
निष्कर्ष
गिद्ध X67 की महाकाव्य उड़ान संरक्षित क्षेत्रों के जुड़े नेटवर्क के महत्व को रेखांकित करती है। सावधानीपूर्वक प्रजनन, ट्रैकिंग और आवास प्रबंधन के साथ, भारत अपनी गिद्ध आबादी को पुनर्जीवित कर सकता है और रणथंभौर जैसे रिज़र्व में पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य (ecosystem health) को मजबूत कर सकता है।