पर्यावरण

पवित्र उपवन: सुप्रीम कोर्ट की नीति, पारिस्थितिकी

पवित्र उपवन: सुप्रीम कोर्ट की नीति, पारिस्थितिकी

खबरों में क्यों?

दिसंबर 2024 में दिए गए एक ऐतिहासिक फैसले में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को देश भर में पवित्र उपवनों (sacred groves) के प्रबंधन और संरक्षण के लिए एक व्यापक नीति विकसित करने का निर्देश दिया। जबकि यह मामला राजस्थान में उपवनों की रक्षा पर केंद्रित था, अदालत के निर्देश के राष्ट्रव्यापी निहितार्थ (implications) हैं। इसका अवलोकन 2026 में भी प्रासंगिक है क्योंकि सरकार प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत करने की तैयारी कर रही है।

पृष्ठभूमि

पवित्र उपवन (Sacred groves) वनों के ऐसे हिस्से हैं जिन्हें स्थानीय समुदायों द्वारा उनके धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्य के लिए संरक्षित किया जाता है। भारत में ये उपवन पेड़ों के छोटे समूहों से लेकर सैकड़ों एकड़ में फैले जंगलों तक भिन्न होते हैं। समुदायों का मानना ​​है कि इन स्थानों पर देवता या पैतृक आत्माएँ (ancestral spirits) निवास करती हैं, और सख्त वर्जनाएँ (taboos) पेड़ों को काटने, शिकार करने या वन उत्पादों को हटाने पर रोक लगाती हैं। ऐसी परंपराएं कृषि-पूर्व युग की हैं और 1800 के दशक से प्रलेखित (documented) की गई हैं। निष्कर्षण वर्जित होने के कारण, पवित्र उपवन अक्सर पुराने पेड़ों, औषधीय पौधों और लुप्तप्राय प्रजातियों को आश्रय देते हैं जो आसपास के परिदृश्यों से गायब हो गए हैं।

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश

  • राष्ट्रीय सर्वेक्षण: न्यायालय ने पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEF&CC) को पवित्र उपवनों की पहचान और मानचित्रण (mapping) करने के लिए एक राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण करने को कहा। इसने नोट किया कि सर्वेक्षण को सीमाओं को चिह्नित करना चाहिए लेकिन प्राकृतिक विकास के लिए लचीलेपन की अनुमति देनी चाहिए।
  • नीति निर्माण: केंद्र सरकार को एक ऐसी नीति बनानी होगी जो पवित्र उपवनों को वन्य जीवन (संरक्षण) अधिनियम 1972 के तहत सामुदायिक भंडार (community reserves) के रूप में मान्यता दे। यह कानूनी सुरक्षा प्रदान करेगा और राष्ट्रीय वन नीति 1988 के साथ प्रबंधन को संरेखित (align) करेगा।
  • समुदायों का सशक्तिकरण: न्यायालय ने वन अधिकार अधिनियम 2006 (Forest Rights Act 2006) के तहत पारंपरिक संरक्षकों (traditional custodians) को मान्यता देने का सुझाव दिया, ताकि वे गतिविधियों को विनियमित कर सकें और संरक्षण के लिए समर्थन प्राप्त कर सकें।
  • पर्यवेक्षी समिति (Supervisory committee): एक सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के नेतृत्व वाली पांच सदस्यीय समिति, मानचित्रण और पहचान प्रक्रिया की देखरेख करेगी और न्यायालय को प्रगति की रिपोर्ट करेगी।

पवित्र उपवन क्यों मायने रखते हैं

  • जैव विविधता की शरणस्थली: पवित्र उपवन मूल वनस्पति के अवशेषों को संरक्षित करते हैं और जैव विविधता के भंडार के रूप में कार्य करते हैं। वे दुर्लभ पौधों, औषधीय जड़ी बूटियों और फसल प्रजातियों के जंगली रिश्तेदारों को आश्रय देते हैं जो अनुसंधान और संरक्षण के लिए मूल्यवान हैं।
  • जल और मृदा संरक्षण: उपवनों के पेड़ बारिश के पानी को सोखते हैं और शुष्क अवधि के दौरान इसे छोड़ते हैं, जिससे आसपास की धाराओं और कुओं को सहारा मिलता है। जड़ें मिट्टी को स्थिर करती हैं, कटाव (erosion) को कम करती हैं और सूक्ष्म जलवायु (micro-climates) को बनाए रखती हैं।
  • सांस्कृतिक पहचान: पवित्र उपवनों से जुड़े अनुष्ठान और त्यौहार सामुदायिक सामंजस्य और पारिस्थितिक प्रबंधन (ecological stewardship) को मजबूत करते हैं। कई उपवनों में टेराकोटा की मूर्तियां, पत्थर के मंदिर और वार्षिक समारोह होते हैं।

निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट का निर्देश पवित्र उपवनों को स्थानीय रीति-रिवाजों से ऊपर उठाकर राष्ट्रीय महत्व का विषय बनाता है। विकास के दबाव और बदलते सामाजिक मूल्यों के सामने इन पारिस्थितिक और सांस्कृतिक खजानों (treasures) को कायम रखना सुनिश्चित करने के लिए एक सुसंगत नीति (coherent policy) विकसित करना और समुदायों को सशक्त बनाना मददगार होगा।

स्रोत: The Hindu

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