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Sahyog Portal: IT Act प्रावधान, I4C और सामग्री नियम

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समाचार में क्यों?

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व में Twitter) ने एक निर्देश (directive) को चुनौती दी है जिसमें उसे भारत सरकार के सहयोग पोर्टल (Sahyog portal) में शामिल होने की आवश्यकता है। यह पोर्टल अवैध ऑनलाइन सामग्री को तेजी से हटाने के लिए डिज़ाइन किया गया है। इस मामले ने भारत के सामग्री विनियमन व्यवस्था (content regulation regime) में डिजिटल अधिकारों और पारदर्शिता के बारे में व्यापक चर्चा छेड़ दी है।

पृष्ठभूमि

सहयोग पोर्टल (Sahyog portal) को केंद्रीय गृह मंत्रालय (Union Home Ministry) द्वारा 2024 में सरकारी एजेंसियों को ऑनलाइन मध्यस्थों (intermediaries) के साथ संवाद करने के लिए एक केंद्रीकृत मंच (centralised platform) के रूप में लॉन्च किया गया था। इसका प्रबंधन भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (Indian Cyber Crime Coordination Centre - I4C) द्वारा किया जाता है। इस पोर्टल का उद्देश्य साइबर अपराध, लापता व्यक्तियों और अन्य संवेदनशील मामलों से संबंधित सामग्री को हटाने में होने वाली देरी को कम करना है। अधिकारी पोर्टल के माध्यम से टेकडाउन नोटिस (takedown notices) जारी करते हैं, और मध्यस्थों को निर्दिष्ट अवधि के भीतर चिह्नित सामग्री को हटाना होगा।

कानूनी ढांचा (Legal framework)

  • आईटी अधिनियम, 2000 की धारा 79 (Section 79 of the IT Act, 2000): यह प्रावधान ऑनलाइन प्लेटफॉर्म को थर्ड-पार्टी सामग्री के लिए "सेफ हार्बर" (safe harbour) प्रदान करता है, जिसका अर्थ है कि यदि वे गैरकानूनी सामग्री के नोटिस का जवाब देते हैं, तो वे उपयोगकर्ता-जनित (user-generated) सामग्री के लिए उत्तरदायी नहीं हैं। सरकारी नोटिस मिलने के बाद कार्रवाई न करने पर यह सुरक्षा समाप्त हो सकती है।
  • आईटी अधिनियम, 2000 की धारा 69A: यह सरकार को राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था जैसे विशिष्ट आधारों पर सामग्री को अवरुद्ध (block) करने के लिए अधिकृत (authorises) करता है। इसके लिए एक लिखित आदेश, एक नामित अधिकारी से अनुमोदन (approval) और एक स्वतंत्र समीक्षा समिति की आवश्यकता होती है, जिससे प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय (procedural safeguards) उपलब्ध होते हैं।
  • आलोचकों की चिंताएं: कुछ कानूनी विद्वानों का तर्क है कि सहयोग पोर्टल के माध्यम से टेकडाउन (takedown) आदेश जारी करने के लिए धारा 79 का उपयोग करना धारा 69A द्वारा अनिवार्य नियत प्रक्रिया (due process) को बायपास करता है। ओवर-सेंसरशिप (over-censorship) और पारदर्शिता की कमी का डर है क्योंकि कई एजेंसियां एक समान समीक्षा प्रक्रिया (uniform review process) के बिना नोटिस जारी कर सकती हैं।

सहयोग पोर्टल की विशेषताएं

  • केंद्रीकृत संचार (Centralised communication): यह मंत्रालयों, राज्य/केंद्र शासित प्रदेशों की पुलिस और 65 ऑनलाइन मध्यस्थों को एक ही मंच पर जोड़ता है, जिससे वास्तविक समय समन्वय (real-time coordination) सक्षम होता है।
  • तेज प्रतिक्रिया (Faster response): सिस्टम को ब्लॉकिंग आदेशों के त्वरित अनुपालन (swift compliance) को सुनिश्चित करने के लिए डिज़ाइन किया गया है, विशेष रूप से समय-संवेदनशील (time-sensitive) जांचों जैसे लापता व्यक्ति के मामलों में।
  • I4C द्वारा रखरखाव: भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (Indian Cyber Crime Coordination Centre) पोर्टल का रखरखाव करता है और तकनीकी सहायता (technical support) की देखरेख करता है।

चिंताएं और चल रही बहस

  • प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय (Procedural safeguards): आलोचक बताते हैं कि पोर्टल में धारा 69A में पाए जाने वाले समीक्षा तंत्र (review mechanisms) का अभाव है। धारा 79 के माध्यम से जारी किए गए आदेश मध्यस्थों (intermediaries) को अनुरोध का विरोध (contest) करने का अवसर प्रदान नहीं कर सकते हैं।
  • पारदर्शिता (Transparency): कितने अनुरोध जारी किए जाते हैं, कौन सी एजेंसियां उन्हें करती हैं और क्या अपील संभव है, इस पर सार्वजनिक जानकारी बहुत कम है। अधिवक्ताओं (Advocates) ने स्पष्ट दिशानिर्देशों (guidelines) और टेकडाउन आंकड़ों (takedown statistics) के प्रकटीकरण (disclosure) का आह्वान किया है।
  • अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (Freedom of expression): उचित जांच के बिना, प्रणाली मनमानी सेंसरशिप (arbitrary censorship) को जन्म दे सकती है और ऑनलाइन भाषण (online speech) को ठंडा कर सकती है। सुरक्षा को स्वतंत्रता के साथ संतुलित करना एक चुनौती बना हुआ है।

महत्व

सहयोग पोर्टल साइबर अपराध को संबोधित करने और हानिकारक सामग्री को तेजी से हटाने को सुनिश्चित करने के सरकार के इरादे को दर्शाता है। हालांकि, चल रहे अदालती मामले स्वतंत्र अभिव्यक्ति (free expression) और नियत प्रक्रिया (due process) की संवैधानिक गारंटी के साथ प्रभावी कानून प्रवर्तन को संतुलित करने की आवश्यकता को उजागर करते हैं। दिशानिर्देश (guidelines) तैयार करने में मध्यस्थों, कानूनी विशेषज्ञों और नागरिक समाज को शामिल करने से सिस्टम में विश्वास बनाने में मदद मिल सकती है।

स्रोत: The Hindu

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