चर्चा में क्यों?
जल-बंटवारे और बांध सुरक्षा के बारे में बहसों ने इस सप्ताह तुंगभद्रा परियोजना (Tungabhadra project) को सुर्खियों में ला दिया। कर्नाटक के होसपेट के पास तुंगभद्रा नदी (Tungabhadra River) पर बना यह बांध कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में सिंचाई, जलविद्युत शक्ति (hydroelectric power) और पीने के पानी के लिए आवश्यक है।
पृष्ठभूमि
तुंगभद्रा नदी तुंगा और भद्रा जलधाराओं (streams) के संगम (confluence) से बनती है, जो कर्नाटक के पश्चिमी घाट (Western Ghats) में निकलती हैं। शिमोगा के पास मिलने के बाद, नदी कृष्णा नदी (Krishna River) में मिलने से पहले लगभग 531 किमी तक पूर्व की ओर बहती है। इसका बेसिन अर्ध-शुष्क दक्कन क्षेत्र (semiarid Deccan region) में कृषि का समर्थन करता है।
19वीं सदी के दौरान मद्रास प्रेसीडेंसी (Madras Presidency) के रायलसीमा (Rayalaseema) क्षेत्र में अकाल ने एक प्रमुख सिंचाई परियोजना की मांग को जन्म दिया। मद्रास और हैदराबाद सरकारों के बीच लंबी बातचीत के बाद, 1949 में तुंगभद्रा बांध का निर्माण शुरू हुआ। आधारशिला 28 फरवरी 1945 को रखी गई थी, लेकिन तकनीकी मतभेदों के कारण 1947 तक काम में देरी हुई।
निर्माण और विशेषताएं
- नदी के तल की खुदाई 1947 में शुरू हुई और चिनाई (masonry) का काम अप्रैल 1949 में शुरू हुआ। 1613 फीट की ऊंचाई पर जल भंडारण की अनुमति देते हुए, अक्टूबर 1953 तक बांध काफी हद तक पूरा हो गया था; स्पिलवे (spillway) और क्रेस्ट गेट (crest gates) 1958 तक समाप्त हो गए थे।
- बांध लगभग 49 मीटर ऊंचा और 823 मीटर लंबा है। इसके जलाशय (reservoir) की क्षमता लगभग 5.6 बिलियन क्यूबिक मीटर है और यह भर जाने पर 378 वर्ग किमी के क्षेत्र को कवर करता है।
- बांध से निकलने वाली नहरें कर्नाटक के कुछ हिस्सों और आंध्र प्रदेश की रायलसीमा क्षेत्र की सिंचाई करती हैं। यह परियोजना लगभग 127 MW की स्थापित क्षमता वाले जलविद्युत संयंत्र (hydroelectric plant) का भी समर्थन करती है।
- निर्माण लागत 16.96 करोड़ रुपये थी और नब्बे गांवों से 54,000 से अधिक लोग विस्थापित (displaced) हुए। मुआवजा और पुनर्वास (Resettlement) प्रमुख चुनौतियां थीं।
लाभ और चिंताएँ
- बांध ने आसपास के क्षेत्र को एक ग्रीन बेल्ट (green belt) में बदल दिया है, जिससे धान, गन्ना, कपास और मूंगफली की खेती संभव हो गई है। यह होसपेटे जैसे शहरों को पीने के पानी की आपूर्ति भी करता है और औद्योगिक विकास की सुविधा प्रदान करता है।
- विशेष रूप से सूखे के वर्षों के दौरान, जल बंटवारे (water sharing) को लेकर कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के बीच समय-समय पर विवाद पैदा होते हैं। गाद (siltation), रिसाव (seepage) और पुराने बुनियादी ढांचे जैसे रखरखाव के मुद्दों पर नियमित ध्यान देने की आवश्यकता है।
- पर्यावरणविद् (Environmentalists) उपजाऊ भूमि और जंगलों के नुकसान को उजागर करते हैं और जलाशय के स्थायी प्रबंधन (sustainable management) का आह्वान करते हैं। बांध के आसपास इकोटूरिज्म (Ecotourism) एक आर्थिक अवसर के रूप में उभरा है।
निष्कर्ष
तुंगभद्रा बांध दो राज्यों के किसानों और उद्योगों के लिए जीवन रेखा बना हुआ है। इसका इतिहास इस बात का उदाहरण है कि कैसे सहकारी नदी-बेसिन प्रबंधन (river-basin management) अकाल-प्रवण क्षेत्र (famine-prone region) को बदल सकता है। इसके निरंतर सफलता के लिए चल रहे रखरखाव, समान जल-बंटवारा और पारिस्थितिक संवेदनशीलता (ecological sensitivity) महत्वपूर्ण होगी।