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Vaccinium piliferum: अरुणाचल में वाइल्ड ब्लूबेरी की फिर से खोज

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समाचार में क्यों?

सोसाइटी फॉर एजुकेशन एंड एनवायरनमेंटल डेवलपमेंट और CSIR‑NEIST के वैज्ञानिकों ने लगभग 188 वर्षों के बाद अरुणाचल प्रदेश के दूरस्थ विजयनगर क्षेत्र में ब्लूबेरी के लुप्तप्राय जंगली रिश्तेदार, Vaccinium piliferum को फिर से खोजने की सूचना दी। यह खोज पूर्वी हिमालय की समृद्ध लेकिन नाजुक जैव विविधता पर प्रकाश डालती है।

पृष्ठभूमि

Vaccinium piliferum Ericaceae परिवार से संबंधित एक चढ़ने वाली झाड़ी है, जिसमें ब्लूबेरी और क्रैनबेरी शामिल हैं। ब्रिटिश वनस्पतिशास्त्री विलियम ग्रिफिथ ने पहली बार 1836 में इस प्रजाति को रिकॉर्ड किया था और इसे आखिरी बार 1850 में एकत्र किया गया था। यह पौधा 4.5 मीटर तक बढ़ सकता है, इसके पत्तों के किनारे लाल होते हैं और यह घंटी के आकार के फूल पैदा करता है जिसके बाद गहरे बैंगनी रंग के फल आते हैं। इसकी संकीर्ण सीमा और आवास के नुकसान के कारण, अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) इसे लुप्तप्राय (endangered) के रूप में सूचीबद्ध करता है।

पुनर्खोज का विवरण

शोधकर्ताओं ने 1,150 और 1,280 मीटर की ऊंचाई के बीच नोआ-दिहिंग नदी (Noa-Dihing River) की सहायक नदियों के किनारे केवल 16 अलग-अलग पौधों का पता लगाया। यह प्रजाति एक एपिफाइट (epiphyte) के रूप में बढ़ती है - उन्हें नुकसान पहुंचाए बिना अन्य पेड़ों पर चढ़ती है - और इसमें विशिष्ट ग्लौकस (नीला-हरा) पुष्प संरचनाएं होती हैं। लगभग दो शताब्दियों के बाद इसकी पुनर्खोज विजयनगर के जंगलों की दूरदर्शिता और विस्तृत वनस्पति सर्वेक्षण की आवश्यकता को रेखांकित करती है। संरक्षणवादियों ने चेतावनी दी है कि झूम खेती (shifting cultivation) और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं से आवास का क्षरण बची हुई छोटी सी आबादी को और खतरे में डाल सकता है।

महत्व

  • जैव विविधता मूल्य: पूर्वी हिमालय एक वैश्विक जैव विविधता हॉटस्पॉट है। दशकों से खोई हुई मानी जाने वाली प्रजाति की पुनर्खोज इसके अनूठे जंगलों को संरक्षित करने के महत्व पर प्रकाश डालती है।
  • आनुवंशिक संसाधन (Genetic resource): खेती किए गए फलों के जंगली रिश्तेदारों में अक्सर कीट प्रतिरोध, पोषण विविधता और जलवायु अनुकूलन क्षमता जैसे लक्षण होते हैं। Vaccinium piliferum ब्लूबेरी और अन्य बेरीज के लिए भविष्य के प्रजनन कार्यक्रमों (breeding programmes) में योगदान दे सकता है।
  • संरक्षण की तात्कालिकता: मुट्ठी भर ही पाए जाने वाले पौधों के साथ, यह प्रजाति अत्यधिक संवेदनशील है। इसके आवास को वनों की कटाई से बचाना और संरक्षण प्रयासों में स्थानीय समुदायों को शामिल करना महत्वपूर्ण है।

निष्कर्ष

Vaccinium piliferum की फिर से खोज इस बात की याद दिलाती है कि भारत के सुदूर जंगलों में कई प्रजातियां छिपी हुई हैं। ऐसे पौधों का दस्तावेजीकरण और संरक्षण करने से खाद्य सुरक्षा मजबूत होगी और पारिस्थितिक विरासत की रक्षा होगी। अधिकारियों को संरक्षण भंडार (conservation reserves) नामित करना चाहिए और इन दुर्लभ प्रजातियों की रक्षा के लिए टिकाऊ आजीविका का समर्थन करना चाहिए।

स्रोत

The Hindu

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