ख़बरों में क्यों?
22 जनवरी 2026 को, नीलगिरी के वेलरीकोम्बई गाँव के आदिवासी कलाकार जे. कृष्णन (J. Krishnan) को कुरुम्बा चित्रकला (Kurumba painting) के प्रति उनके समर्पण के लिए मरणोपरांत (posthumously) पद्म श्री (Padma Shri) से सम्मानित किया गया। इस सम्मान ने इस लुप्तप्राय (endangered) स्वदेशी कला रूप की ओर राष्ट्रीय ध्यान आकर्षित किया, जिसका अभ्यास आज दस से भी कम कलाकारों द्वारा किया जाता है।
पृष्ठभूमि
कुरुम्बा चित्रकला कुरुम्बा और तमिलनाडु के नीलगिरी पहाड़ों में अन्य स्वदेशी समुदायों की एक प्रागैतिहासिक कला परंपरा (prehistoric art tradition) है। पुरातत्वविद (Archaeologists) इसकी उत्पत्ति (origins) को 3,000 से अधिक वर्षों से जक्कनराय (Jackanarai) और एलुथु पारई (Eluthu Paarai) जैसे स्थलों पर पाए गए रॉक कला (rock art) से जोड़ते हैं। वेलरीकोम्बई (Velaricombai) और कोट्टप्पाडी (Kottappadi) जैसे गांवों में, कलाकार कभी त्योहारों और अनुष्ठानों (rituals) के दौरान साधारण आकृतियों के साथ घरों और गुफाओं की दीवारों को सजाते थे।
कुरुम्बा कला की विशेषताएं
- प्राकृतिक रंग (Natural colours): कलाकार लाल, पीले, सफेद और काले रंग के मिट्टी के स्वर (earthen tones) बनाने के लिए पेड़ की छाल (tree bark), खनिज गेरू (mineral ochres) और पौधे के रेजिन (plant resins) से पिगमेंट पीसते हैं। स्थायित्व (durability) के लिए इन रंगों को पानी और इमली के बीजों (tamarind seeds) के साथ मिलाया जाता है।
- न्यूनतम शैली (Minimalist style): आकृतियाँ बिंदुओं (dots), रेखाओं (lines) और त्रिकोणों (triangles) से बनी होती हैं, जो अक्सर शिकारियों (hunters), नर्तकियों (dancers), जानवरों (animals) और वन आत्माओं (forest spirits) को दर्शाती हैं। पेंटिंग रोजमर्रा की जिंदगी (daily life) और आध्यात्मिक मान्यताओं (spiritual beliefs) को एक रैखिक (linear), अमूर्त शैली (abstract style) में कैद करती हैं।
- औपचारिक संदर्भ (Ceremonial context): कुरुम्बा पेंटिंग पारंपरिक रूप से फसल उत्सव (harvest festivals), शादियों (marriages) और घर-निर्माण समारोहों (house-building ceremonies) के दौरान बनाई जाती हैं। ऐसा माना जाता है कि वे पैतृक आत्माओं (ancestral spirits) के संरक्षण को आमंत्रित करती हैं।
चुनौतियाँ और पुनरुद्धार (Challenges and revival)
- घटते व्यवसायी (Declining practitioners): आधुनिक शिक्षा और आर्थिक दबावों के साथ, कुछ ही युवा कुरुम्बा लोग इस कला को सीखते हैं। आज एक दर्जन से भी कम कलाकार परंपरा को जारी रखे हुए हैं।
- प्रलेखन का अभाव (Lack of documentation): चूंकि पेंटिंग दीवारों पर बनाई जाती हैं और मौसम के संपर्क में आती हैं, इसलिए कई काम फीके (faded) पड़ गए हैं या खो गए हैं। तकनीकों और प्रतीकवाद (symbolism) का सीमित अभिलेखीय रिकॉर्ड (archival record) है।
- पुनरुद्धार के प्रयास (Revival efforts): कृष्णन जैसे व्यक्तियों ने बच्चों को शिल्प सिखाया है और प्रदर्शनियों का आयोजन किया है। सांस्कृतिक संगठन प्रलेखन (documentation), वित्तीय सहायता और स्कूल के पाठ्यक्रम (curricula) में आदिवासी कला (tribal art) को शामिल करने की वकालत करते हैं।
महत्व
कुरुम्बा पेंटिंग जीवित समुदायों को उनकी प्राचीन विरासत (ancient heritage) और उन जंगलों से जोड़ती है जिनमें वे रहते हैं। इस कला को संरक्षित करने से सांस्कृतिक गौरव (cultural pride) बढ़ता है और पर्यटन और हस्तशिल्प (handicrafts) के माध्यम से आजीविका (livelihood) के अवसर मिलते हैं। राष्ट्रीय पुरस्कारों (national awards) द्वारा मान्यता निरंतर समर्थन की आवश्यकता को रेखांकित करती है।
स्रोत: Indian Express