Polity (राजव्यवस्था)

NCLAT Dispute Resolution: दिवाला और दिवालियापन संहिता, लेनदारों की समिति

NCLAT Dispute Resolution: दिवाला और दिवालियापन संहिता, लेनदारों की समिति

चर्चा में क्यों?

राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय अधिकरण (National Company Law Appellate Tribunal - NCLAT) ने हाल ही में कॉर्पोरेट रिज़ॉल्यूशन प्लान (corporate resolution plan) के तहत धन के वितरण के संबंध में राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (NCLT) के एक आदेश को बरकरार रखा। असहमत बैंकों (dissenting banks) के एक संघ ने लेनदारों की समिति (Committee of Creditors) द्वारा अनुमोदित वितरण तंत्र को चुनौती दी थी, लेकिन अपीलीय अधिकरण ने उनकी अपील को खारिज कर दिया और पुष्टि की कि स्वीकृत योजना निष्पक्ष और वैध थी।

पृष्ठभूमि (Background)

NCLAT कंपनी अधिनियम 2013 (Companies Act 2013) की धारा 410 के तहत गठित एक विशेष अपीलीय निकाय है। यह राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (NCLT), भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड (Insolvency and Bankruptcy Board of India - IBBI) और भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (Competition Commission of India - CCI) के निर्णयों के खिलाफ अपील सुनता है। अधिकरण कॉर्पोरेट वादियों के लिए एक त्वरित उपाय प्रदान करता है, जिससे उच्च न्यायालयों पर बोझ कम होता है।

संरचना और अधिकार क्षेत्र (Composition and jurisdiction)

  • सदस्य (Members): अधिकरण का नेतृत्व एक अध्यक्ष (Chairperson) द्वारा किया जाता है, जो आमतौर पर सुप्रीम कोर्ट का एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश या उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश होता है। कानून, वित्त और प्रबंधन में विशेषज्ञता के साथ अधिकतम 11 न्यायिक सदस्य (Judicial Members) और तकनीकी सदस्य (Technical Members) होते हैं। सदस्य पांच साल या 67 वर्ष (न्यायिक सदस्यों के लिए) या 65 वर्ष (तकनीकी सदस्यों के लिए) की आयु तक सेवा करते हैं।
  • अपीलों का दायरा (Scope of appeals): NCLAT कंपनी अधिनियम, दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (Insolvency and Bankruptcy Code - IBC), और प्रतिस्पर्धा अधिनियम (Competition Act) की धारा 53 के तहत NCLT द्वारा पारित आदेशों के खिलाफ अपील सुनता है। इसके फैसलों को केवल कानून के बिंदुओं पर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है।
  • उद्देश्य (Objective): कॉर्पोरेट विवादों को सुलझाने के लिए एक कुशल और विशेष मंच प्रदान करना, जिससे भारत में व्यापार करने में आसानी (ease of doing business) में सुधार हो।

हालिया मामला (Recent case)

मीडिया का ध्यान आकर्षित करने वाले इस मामले में, पांच बैंकों - इंडियन बैंक, यूको बैंक, बैंक ऑफ बड़ौदा, आईसीआईसीआई बैंक और यूनियन बैंक ऑफ इंडिया - ने OCL आयरन एंड स्टील (OCL Iron and Steel) के रिज़ॉल्यूशन प्लान के तहत धन के वितरण को चुनौती दी। उनका तर्क था कि भारतीय स्टेट बैंक (State Bank of India) और पंजाब नेशनल बैंक (Punjab National Bank) जैसे असहमत ऋणदाताओं को अनुपातहीन हिस्सा मिला। जस्टिस अशोक भूषण के नेतृत्व वाली दो-सदस्यीय NCLAT पीठ ने माना कि वितरण दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता के अनुरूप था और इसे लेनदारों की समिति और NCLT द्वारा अनुमोदित किया गया था। अधिकरण ने जोर देकर कहा कि एक निगरानी समिति एक स्वीकृत वितरण तंत्र को नहीं बदल सकती है और असहमत लेनदारों को लेनदारों की समिति के सामूहिक निर्णय का पालन करना चाहिए।

महत्व (Significance)

  • दिवाला कार्यवाही में निश्चितता (Certainty in insolvency proceedings): अनुमोदित वितरण को बरकरार रखते हुए, NCLAT ने लेनदारों की समिति की प्रधानता को सुदृढ़ किया और भविष्य के समाधानों के लिए स्पष्टता प्रदान की।
  • मुकदमेबाजी को कम करना (Reducing litigation): NCLAT जैसे विशेष अपीलीय अधिकरण कॉर्पोरेट विवादों के समाधान में तेजी लाते हैं, जिससे उच्च न्यायालयों और सुप्रीम कोर्ट को अन्य मामलों पर ध्यान केंद्रित करने की स्वतंत्रता मिलती है।
  • निवेशकों का विश्वास (Investor confidence): दिवाला मामलों में अनुमानित परिणाम निवेशकों को तनावग्रस्त परिसंपत्ति बाजारों (stressed asset markets) में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करते हैं और संकटग्रस्त फर्मों के त्वरित बदलाव की सुविधा प्रदान करते हैं।
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